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Ballia News: निरक्षर से स्नातक तक कर रहे प्रधानी

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पंदह। गांव बदल रहे हैं, लोग स्मार्टफोन चला रहे हैं, योजनाओं की जानकारी मोबाइल पर ले रहे हैं, लेकिन जब बारी आती है नेतृत्व चुनने की, तो फिर पुरानी गलती दोहरा देते हैं। कुशल और शिक्षित नेतृत्व की अपेक्षा रखने वाले ग्रामीण अक्सर बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंप देते हैं, जिन्हें न तो फाइल पढ़नी आती है, न पोर्टल चलाना। सवाल उठता है कि जहां नेतृत्वकर्ता ही अशिक्षित या अक्षम हो, वहां विकास की पटकथा कैसे लिखी जा सकती है। डीपीआरओ अवनीश कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि ग्राम प्रधानों को सचिव के माध्यम से जानकारी दी जाती है। समय-समय पर प्रशिक्षण के माध्यम से ग्राम पंचायतों के संचालन के बारे में बताया जाता है।
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पंदह में लगभग आधे प्रधान कम पढ़े लिखे
सिकंदरपुर तहसील के पंदह ब्लॉक में 45 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से केवल 23 प्रधान (51%) स्नातक या उच्च शिक्षित हैं, जबकि 12 प्रधान सिर्फ प्राथमिक शिक्षा प्राप्त हैं। इसी तरह 4 हाईस्कूल, 3 इंटरमीडिएट और 1 मात्र साक्षर हैं। चकबहाउद्दीन और जनुवान ग्राम पंचायतों का डेटा अब तक अपडेट नहीं हो सका है। लिहाजा कम पढ़े लिखे प्रधान योजनाओं की फाइलें, ऑनलाइन अपडेशन, टाइड और अनटाइड ग्रांट, बजट अपलोड या ऑनलाइन पोर्टल जैसे शब्दों का अर्थ समझने के लिए दूसरे का सहारा लेना पड़ता है। उन्हें यहां तक पता नहीं रहता कि किस मद में कितनी धनराशि आई है। उसका उपभोग कहां और कैसे करना है। ये प्रधान तथाकथित सहयोगियों की कठपुतली बन कर रह जाते हैं।
नवानगर में शिक्षा की ताकत ने बढ़ाई विकास की रफ्तार
इसके विपरीत, नवानगर ब्लॉक ने पढ़े-लिखे नेतृत्व के बूते विकास की मिसाल पेश की है। यहां के 50 ग्राम प्रधानों में 62 प्रतिशत (31 प्रधान) स्नातक या उससे अधिक शिक्षित हैं। शेष में 8 हाईस्कूल, 2 इंटर, 1 डिप्लोमा धारक, 6 प्राथमिक, 1 साक्षर और 1 निरक्षर हैं। शिक्षित प्रधानों सोच और समझ का नतीजा रहा कि नवानगर ब्लॉक ने जिले में विकास मॉनिटरिंग और डिजिटल रिपोर्टिंग में पहली रैंक हासिल की। प्रधानों ने न सिर्फ फाइलों की भाषा समझी अपितु उसे धरातल पर उतरा और योजनाओं की गति दी। दोनों ब्लॉकों में अभी भी कई पंचायतों के प्रधान महज रबर स्टांप बनकर रह गए हैं। फैसले पंचायत सचिव, रोजगार सेवक या प्रधान के किसी करीबी के इशारे पर होते हैं। नतीजा योजनाओं का लाभ पात्रों तक नहीं पहुंचता और विकास ठहर जाता है।
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चौपालों में शिक्षा पर छिड़ी चर्चा
भले चुनाव में अभी विलंब है लेकिन चुनावी चौपालों में शिक्षा को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। आस पास के गांवों से तुलना कर यह स्वीकारने लगे हैं कि नेतृत्व कुशल और सक्षम होना होगा। अन्यथा गांवों की टूटी सड़कें, जाम नालियां और अटके काम रोना ऐसे ही लगा रहेगा। लोगों का साफ कहना है कि जब तक शिक्षित नेतृत्व नहीं चुना जाएगा, गांव की किस्मत नहीं बदलेगी। रिश्तेदारी और जातीय समीकरण से गांव की तस्वीर नहीं बदलने वाली।
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