काम-धन्धे छूटने और गैर प्रान्त में दो माह से अधिक दिनों तक जीने की पीड़ा मजदूर नहीं भुला पा रहे हैं। बिहार प्रांत के मजदूरों ने बताया कि सपनों को लेकर परदेस कमाने गया था लेकिन लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद होने के बाद ऐसा दर्द मिला है कि अब फिर वहां जाने की हिम्मत नहीं पड़ेगी।
बिहार के समस्तीपुर जिले के अजय कर्मकार ने बताया कि जोधपुर की एक स्टील फैक्ट्री में नौकरी करते थे। लॉकडाउन में फैक्ट्री में ताला लगा तो दो माह में जो कुछ बचाकर रखा था वह सब खर्च हो गया। अब घर जाने के एक रुपये जेब में नही बचे थे। कहा कि परदेस सपनों को लेकर कमाने गए थे अब ऐसा दर्द लेकर लौटे हैं कि फिर वहां जाने का सवाल ही नहीं है।
उनके साथी सआनन्द कर्मकार ने कहा कि अब परदेस में कुछ नहीं है, वहां तो सब बेगाने हैं। किसी तरह सड़कों परभोजन बांटने वाले दानदाताओं की कृपा से इतने दिन काम चल गया। गांव में एक एकड़ खेती है, अब पसीना उसी पर बहाऊंगा, लेकिन परदेस का मुंह नहीं देखूंगा। पूर्णिया के दिनेश, कटिहार के जयशंकर ने कहा कि अब जल्द हालात नहीं ठीक होंगे, ऐसे में गांव ही अपना बेहतर है। राजस्थान के टपूकड़ा में कबाड़ का काम करने वाले विनोद, पंकज, मिंटू एकमा के रहने वाले हैं।
कहा कि शुक्रवार को पैदल गांव के लिए चले थे। महिलाएं और छोटे बच्चे साथ में हैं। दो स्थान पर पुलिस ने वाहन में बैठाया फिर पैदल चले, जेब में कुछ नहीं बचा। अब गांव में कुछ काम कर गुजारा करने का अरमान लेकर जा रहे हैं। मधुबन के मुकेश, वैशाली के विशाल और उनके साथी अलवर में मजदूरी करते थे। बताया कि किसी तरह कानपुर पहुंचे और वहां से ट्रेन से बलिया और यहां से फिर बस से बैरिया तक पहुंचे हैं। भागलपुर निवासी नन्दजी राजस्थान में रुपये कमाकर बेटी को ब्याहने और बेटा को अफसर बनाने का सपना संजोए था जो अधूरे रह गए।