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न्यायालयों में वादों का अम्बार, अधिकारियों को फुर्सत नहीं

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बलिया। जनपद में राजस्व विभाग के सभी न्यायालयों में हजारों की तादाद में मुकदमें लंबित पड़े हैं। चाहे वह एसडीएम कोर्ट हो या फिर तहसीलदार कोर्ट। यहां नियमित अधिकारियो के नहीं बैठने से मामलों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है, जिसके चलते वादकारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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लाख प्रयास के बावजूद जिले में विभिन्न तरह के वादों का निस्तारण सालों बाद भी नहीं हो पा रहा है। जनपद मुख्यालय पर राजस्व विभाग के जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, मुख्य राजस्व अधिकारी, एसडीएम सदर, तहसीलदार सदर, नायब तहसीलदार गड़हा, गड़वार व नगर के अलावा चकबंदी विभाग के चार प्रमुख कोर्ट हैं। आंकड़ों को देखें तो जिलाधिकारी कोर्ट में पांच हजार से अधिक मामले हैं जिसमें कई मामले तो करीब दो दशक पुराने हैं। बतौर उदाहरण भू-राजस्व अधिनियम के वाद संख्या डी 1998159001ह्रदयानंद बनाम राधाकिशुन वर्ष 1998-99 में दायर किया गया। लेकिन 19 साल बाद भी इस मामले का निस्तारण नहीं हो सका है और वर्तमान में इसकी सुनवाई छह सितंबर को निर्धारित की गई है और इसमें बहस होनी है। इसी तरह एडीएम कोर्ट में भी कुल तीन हजार मामले हैं जिसमें कई मामले डेढ़ से दो दशक पुराने हैं। बतौर उदाहरण वाद संख्या टी 20051593123 वर्ष 2004-05 में सच्चिदानंद बनाम अनिल कुमार दायर हुआ लेकिन 12 साल बाद भी निस्तारित नहीं हो सका है। एसडीएम सदर कोर्ट में सालों से चार हजार से अधिक मामले चल रहे हैं। इस कोर्ट में वर्ष 1999-2000 में दफा 154 के तहत दायर धु्रवनारायण बनाम इंद्रदेव मुकदमा आज भी चल रहा है। तहसीलदार कोर्ट में भी पांच हजार से अधिक मामले सालों से लंबित हैं। इसमें वर्ष 2004-05 में दायर वाद संख्या टी 2005193129 सच्चिदांनद बनाम अनिल कुमार का निस्तारण 12 साल बाद भी नहीं हो सका है। सोमवार को सुनवाई के लिए कुल 138 मुकदमें सूचीबद्ध किए गए थे। लेकिन वादकारी देखते रह गए लेकिन वह कोर्ट में बैठे ही नहीं। हालांकि कुछ अधिवक्ताओं ने उनके कक्ष में जाकर पत्रावलियों को जरुर दिखाया।
सदर तहसील में तीन नायब तहसीलदार गड़हा, गड़वार व नगर कोर्ट है। लेकिन इन न्यायालयों में महीनों से कोई सुनवाई य्नञहीं हो रही है। बताया जाता है कि एकमात्र नायब तहसीलदार मु. मुज्जबिल पिछले तीन महीने से मेडिकल अवकाश पर हैं। न्यायालय के कर्मचारियों की मानें तो नामांतरण समेत अन्य मामले के निस्तारण की करीब 12 सौ पत्रावलियां पड़ी हुई हैं। इसके लिए जिला प्रशासन की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं की गई है। यह तो महज उदाहरण है। आलम यह है कि खासकर प्रशासनिक अधिकारियों के कोर्ट में नहीं बैठने के कारण एक ओर जहां मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर सालों तक वादों के लंबित रहने के कारण वादकारियों के समय तथा पैसे की बर्बादी भी हो रही है। बताया जाता है कि प्रशासनिक अधिकारी आए दिन अन्य कार्यों में व्यवस्त रहते हैं। इसके अलावा रोजाना 12 बजे तक कक्ष में फरियादियों की समस्याएं सुनने का भी प्रावधान है। सोमवार को भी कमोवेश यही स्थिति देखने को मिली। सुबह 11.30 बजे डीएम कक्ष में बैठ कर आम लोगों की समस्याएं सुन रहे थे, लिहाजा कोर्ट खाली पड़ा था। यही स्थिति तहसील में एसडीएम के यहां भी रही।
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