बलिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जो 1857 से शुरू हुआ था, 1942 आते-आते एक निर्णायक मुकाम पर पहुंच गया। आजादी के इस आंदोलन में दुनिया की सबसे बड़ी अहिंसक जनक्रांति नौ अगस्त 1942 को बलिया में हुई थी। इसमें जनता ने ब्रिटिश साम्राज्य से सत्ता छीनकर स्वराज और सुराज की स्थापना की।
वर्ष 1941 के द्वितीय महायुद्ध ने दुनिया का इतिहास और भूगोल बदलने का काम किया। इस दौरान भारत में कांग्रेस सत्याग्रह चला रही थी। ब्रिटिशों को दबाव में देख उसने आजादी के लिए सुलह करने का प्रस्ताव रखा। जनवरी 1942 में कांग्रेस ने सत्याग्रह वापस ले लिया लेकिन चालाक अंग्रेज़ी हुकूमत ने क्रिप्स मिशन नाटक खेल दिया। उसने आंदोलन से मुसलमानों और अनुसूचित जातियों को अलग करने की साजिश रची। कुछ दिनों बाद कांग्रेस के नेताओं को अंग्रेजों की चालबाजी समझ में आने लगी। सात अगस्त को बंबई की सभा में महात्मा गांधी ने कहा कि अब हमें आजादी लड़कर ही लेनी पड़ेगी। यहीं से अगस्त क्रांति का निर्णायक आंदोलन अंग्रेजों भारत छोड़ो, करो या मरो शुरू हुआ।
नौ अगस्त को बंबई के ग्वालिया टैंक में सभा करने का फैसला हुआ। इसके बाद पूरे देश में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। बलिया में ठाकुर जगन्नाथ सिंह, शिवपूजन सिंह, चित्तू पांडेय, महानंद मिश्र, बालेश्वर सिंह जैसे बड़े नेता पहले से जेल में बंद थे। राधामोहन सिंह, राधा गोविंद सिंह, रामनरेश सिंह, परमात्मानंद सिंह को पुलिस ने आठ अगस्त को गिरफ्तार कर लिया। बलिया शहर में केवल दो लोगों के पास रेडियो का लाइसेंस था। फिर भी महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सरदार बल्लभभाई पटेल आदि नेताओं की बंबई में गिरफ्तारी की खबर बलिया पहुंच गई।
जिले के कौमी सेवादल, ग्राम रक्षक दल, किसान संगठन और देशभक्त युवाओं ने बलिया को आजाद कराने की तैयारी शुरु कर दिया। युवाओं के इस जोश में सबसे बड़ी बाधा नेता का अभाव था। सभी बड़े नेता जेल में बंद थे। केवल कांग्रेस के शहर मंत्री उमाशंकर सोनार बाहर थे और वह बगैर पुष्टि के आगे बढ़कर कुछ करने को तैयार नहीं थे। इसी बीच 15 साल के सूरज प्रसाद ने वह अखबार जिसमें गांधीजी की अंग्रेजों भारत छोड़ो और करो या मरो वाला भाषण एवं उनकी गिरफ्तारी की खबर छपी थी, लाकर दिखाया और बलिया की आजादी को सड़क पर उतर गया। आलम यह रहा कि बलिया के हर कोने से अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे गूंजने लगे थे और. ब्रिटिश हुकूमत का विरोध गांव से लेकर शहर तक शुरू हो गया था।.
रेलवे लाइन उखाड़कर विरोध करने में सेनानी कूद गए। कई जगह पोस्टऑफिस जला दिए गए। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को दबाने के लिए पुरजोर कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली और उनके पांव जनपद से उखड़ गए।
सेनानी को तत्कालीन पीएम ने दिया था ताम्र पत्र
लालगंज। अंग्रेजों भारत छोड़ो की लौ बैरिया क्षेत्र में पहुंची थी। क्षेत्र के बहुआरा स्थित बजरंग आश्रम पर युवाओं की बैठक हुई। इसमें बहुआरा निवासी भूपनारायण सिंह को कमांडर नियुक्त किया गया और आगे की लड़ाई उनकी अगुवाई में लड़ने का फैसला किया गया। वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सेनानी भूपनारायण को ताम्रपत्र भी दिया था।