उनका सवाल था कि क्या मैं उस मानक के अनुसार पीपीई किट तैयार कर सकता हूं। पहली बार तो उनका सवाल बचकाना लगा कि जिस पीपीई किट की मांग पूरी दुनिया में हो रही है और कंपनियां उनकी आपूर्ति नहीं कर पा रही हैं, मैं कैसे तैयार कर सकता हूं, लेकिन फिर सोचा इस समय सभी काम बंद हैं तो इस प्रयास को कर लेने में क्या बुराई है। मुझे आज खुशी है कि मैं जैन साहब की उम्मीदों पर खरा उतरा।
जो पीपीई किट बनाई वह चिकित्साकर्मियों को संक्रमण से बचाने में पूरी तरह कामयाब रही। उन्होंने बताया कि बाद में कपड़ा मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से नई गाइडलाइन जारी हुई। इसके बाद किट को केंद्र सरकार की कानपुर स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री की लेबोरेटरी में भेजा गया। बेसिक जांच में इसकी गुणवत्ता सही मिलने पर वहां के एडिशनल जनरल मैनेजर ने खुशी जाहिर की। वहां से यूनिक सर्टिफिकेट कोड (यूसीसी) दिया गया।
स्थानीय स्तर पर पीपीई किट उपलब्ध होने से एक बड़ा फायदा यह हुआ कि नो प्रॉफिट-नो लॉस के आधार पर अन्य जिले के मुकाबले आधे खर्च में कोरोना योद्धाओं के लिए सुरक्षा कवच मिल गया। पीपीई किट पर अन्य जिलों की अपेक्षा यहां कम खर्च हुआ। जो किट अन्य जिलों में 1200 की पड़ रही थी, यहां 600 में उपलब्ध हो गई।
वर्ष 2019 में जिले में उद्यम समागम हुआ था और उसमें उद्यमियों को आमंत्रित किया गया था। अपेक्षा थी कि बलिया में भी औद्योगिक इकाइयां स्थापित की जाएं और कुछ नया स्टार्टअप हो। कोरोना काल में यह सोच पूरी होती दिखी और स्थानीय स्तर पर बनी पीपीई किट के रूप में यह स्टार्टअप मिला।
सुरेंद्र ने बताया कि जरूरत पड़ने पर वे कभी भी सौ-दो सौ पीपीई किट बनवा सकते हैं। यही नहीं, अगर अन्य जिलों को जरूरत पड़ी तो उन्हें उपलब्ध भी करा सकते हैं। हफ्ते भर का समय मिला तो हजार-डेढ़ हजार किट देने की क्षमता है। मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो प्रदेश का यह पहला जनपद है जहां स्थानीय स्तर पर बेहतर गुणवत्ता का पीपीई किट तैयार किया गया। इसका लाभ ये भी हुआ कि मेरे साथ जुड़े लगभग 25 से 30 परिवारों को भी लॉकडाउन में आर्थिक दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। उन्हें काम के साथ वेतन भी मिलता रहा।