बलिया। सबदरा गांव (कोथ) में पालतू कुत्ते द्वारा ढाई साल के मासूम का चेहरा नोचने की घटना ने सबको हिला कर रख दिया है। जिला अस्पताल में जिंदगी और दर्द के बीच जूझ रहे ढाई साल के मासूम आदित्य की हालत ने व्यवस्था की नींव हिला दी है। यह हादसा ऐसे समय हुआ है, जब आवारा कुत्तों के नियंत्रण के लिए शासन के स्पष्ट और विस्तृत आदेश जारी हुए छह माह से अधिक समय बीत चुका है। यह घटना महज एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर सीधा सवाल है, जो शासनादेशों को फाइलों में सजाकर रखने में माहिर है।
हैरानी की बात यह है कि आवारा कुत्तों के नियंत्रण के लिए शासन के स्पष्ट निर्देश के बावजूद नगर पंचायत सिकंदरपुर सहित जिले की किसी भी नगर पालिका या नगर पंचायत में एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) कार्यक्रम की ठोस शुरुआत नहीं हो सकी है। न डॉग केयर सेंटर अस्तित्व में आए, न बंध्याकरण और टीकाकरण का कोई संगठित अभियान ही अब तक शुरू हो पाया है। नतीजा यह कि कुत्तों का आतंक बढ़ता गया और उसकी कीमत मासूम बच्चे को चुकानी पड़ी।
यह दिया गया था निर्देश
एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) नियम 2023 के तहत नगर निकायों को डॉग केयर सेंटर स्थापित करने, कुत्तों के बंध्याकरण, टीकाकरण, टैगिंग, पुनर्वास और जनशिकायतों के निस्तारण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन बलिया जिले में यह पूरा तंत्र आज भी फाइलों में कैद नजर आता है। नगर विकास विभाग के 30 जून 2025 के आदेश के तहत उन्हें पकड़ने, सुरक्षित परिवहन, सर्जरी, टीकाकरण, टैगिंग, रिकॉर्ड और पुनः उसी क्षेत्र में छोड़े जाने तक का पूरा प्रोटोकॉल तय किया गया था लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आदेश का रोडमैप जिले में कहीं नजर नहीं आता। कुछ अधिशासी अधिकारियों को शासनादेश की पूरी जानकारी तक नहीं है। कुछ जिम्मेदार इसे नगर पालिका का विषय बताकर अपना पल्ला झाड़ ले रहे हैं। नगर पालिका और नगर पंचायत के जिम्मेदार पशुपालन विभाग को ही जिम्मेदार ठहरा रहे है।
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नाराजगी और प्रशासन पर दबाव
घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते एबीसी कार्यक्रम लागू किया गया होता, तो ऐसी घटना नहीं होती। गांव से लेकर नगर क्षेत्र तक सैकड़ों आवारा कुत्ते घूम रहे हैं जो किसी को कभी भी अपना शिकार बना सकते हैं। लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। सवाल यह है कि छह महीने बाद भी आदेश धरातल पर नहीं क्यों नहीं उतारा गया।
आदेश से अनजान निकायों के जिम्मेदार
ढाई साल के मासूम का घायल होना कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की उस गहरी खाई को बेपर्दा करता है, जिसे प्रशासन अक्सर नजरअंदाज करता रहा है। हैरानी तब और बढ़ जाती है, जब जिम्मेदार अधिकारी शासनादेशों से सीधा पल्ला झाड़ते नजर आते हैं। बानगी के तौर पर नगर पंचायत मनियर के अधिशासी अधिकारी का बयान सामने आया है। उनका साफ कहना था कि इस तरह का कोई आदेश नगर पंचायत के लिए जारी ही नहीं हुआ है और यह केवल नगर पालिका से जुड़ा मामला है।
यह बयान न सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है, बल्कि उस गंभीर भ्रम की भी तस्दीक करता है, जिसके चलते आवारा कुत्तों की समस्या लगातार विकराल होती जा रही है। जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी जब यह स्वीकार कर ले कि उसके क्षेत्र में न तो आवारा कुत्तों को पकड़ने की कोई व्यवस्था है और न ही बंध्याकरण या टीकाकरण का कोई कार्यक्रम चलाया जा रहा है, तो यह साफ हो जाता है कि शासन के आदेश जमीन तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। मासूम की चोट दरअसल सिस्टम की उसी सच्चाई को उजागर करती है, जिसमें जिम्मेदारी तय करने के बजाय उससे बचने की होड़ लगी हो। सवाल यही है कि यदि हर निकाय आदेश को किसी और के खाते में डालता रहेगा, तो आमजन की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा।
सिर्फ नाम की निगरानी समिति
एबीसी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिलास्तरीय निगरानी समिति गठित करने का प्राविधान किया गया है। नियमों के अनुसार, हर माह समीक्षा बैठक, प्रगति की मॉनिटरिंग और लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई अनिवार्य है। पर यह समिति कागजों से बाहर नहीं निकली। यदि समिति मौजूद है, तो छह माह में एक भी डॉग केयर सेंटर क्यों शुरू नहीं हुआ। अगर बैठकें हुईं, तो उनके फैसलों का असर सड़कों पर क्यों नहीं दिख रहा। कोथ की घटना ने साबित कर दिया कि निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल है। समिति का काम नगर निकायों को समयबद्ध कार्रवाई के लिए बाध्य करना था, लेकिन न तो एबीसी अभियान चला, न टीकाकरण हुआ और न ही आवारा कुत्तों की पहचान व टैगिंग शुरू हुई।
हनुमानगंज में बनना है सेंटर
नगर पंचायत चितबड़ागांव के ईओ सुरेश कुमार मोर्या ने बताया कि जिले के सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायत एबीसी के तहत नसबंदी सेंटर का निर्माण होना है। उधर मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुशील कुमार मिश्रा का कहना है कि पूरे जनपद के लिए एबीसी डाग क्षेत्र के लिए हनुमानगंज में निर्माण प्रस्तावित है। सभी निकायों से लावारिस कुत्तों के संबंध में जानकारी मांगी गई है, जो अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
इनकी की गई गणना
नगर पालिका - कुत्ते
बलिया - 250
रसड़ा - 193
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नगर पंचायत - कुत्ते
चितबड़ागांव - 113
मनियर - 165
रतसर - 400
सिकंदरपुर- 150 (25 बंदर)
सहतवार - 80
बैरिया - 77
रेवती - 82
बांसडीह (ईओ को जानकारी नहीं)
बेल्थरारोड (चेयरमैन को जानकारी नहीं)
नगरा (ईओ को जानकारी नहीं)
पालतू कुत्ते-1476