बलिया। जिले की साख में चार-चांद लगाने वाला ऐतिहासिक ददरी पशु मेले से चिड़ियों की चहक, तोता-मैना की मीठी आवाज तथा दुधारु पशुओं की नस्ल का अस्तित्व विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। विभिन्न प्रांतों से पशुओं का आवक कम हो गई है। कभी मेले में जहां पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार आदि से पशु आकर मेले की शोभा बढ़ाते थे अब कई पशुओं की नस्लें नहीं दिखाई देती हैं। वर्तमान में पशु मेला गुलजार तो है, लेकिन लोग कुछ अलग खरीद-फरोख्त के लिए तरस गए हैं। कभी ददरी मेले में पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी व्यापारी घोडे़ लेकर आते थे। इन्हें देखने के लिए मेले में लोगों की भीड़ जुटती थी अब सबकुछ बीते दिनों की बात हो चुकी है। फिलहाल वक्त अपनी राह बदल चुका है और मेला दिनों-दिन सिमटता जा रहा है। पहले पशु व्यापारी ददरी के पशु मेला खत्म होने के बाद उसके जल्द आने की राह देखने लगते थे। लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ नहीं होता है। पुराने पशु पालक बताते हैं कि कभी मेले में हाथी छोड़कर सभी जानवरों की खरीद-फरोख्त होती थी। यहां विभिन्न प्रजातियों की चिड़ियां व तोता-मैना तक बिकते थे। अच्छी नस्ल की गाय, भैंस, बैल, बछड़ों की बिक्री के लिए सुदूर से पशु व्यापारी आया करते थे। वे व्यापारी एक वर्ष तक जानवरों को मेले के लिए तैयार करते थे तथा दीपावली के समय ट्रकों के सहारे लादकर लाते थे। मवेशियों का झूंड उसके गर्दन में लटकता घुंघरू की घनघनाहट लोगों का मन मोह लेती थी। लेकिन आज वह दृश्य कहीं खो गया। मवेशियों के साथ क्रेता व विक्रेता का हुजूम कभी नंदीग्राम से चित्तू पांडेय तक देखने को मिलता था। यह कार्तिक पूर्णिमा के 15 दिन पहले से बाद तक पटा रहता था। लेकिन आज उस मवेशियों की आवक कम हो गई है। सड़कों पर जानवरों का झुंड भी नहीं दिखाई देता। आलम यह है कि विभिन्न प्रांतों से व्यापारियों का आना काफी कम हो गया है। आज मेला की कश्ती डूबने लगी है, लेकिन उस कश्ती को साहिल (किनारा) देने वालों की तादाद काफी कम हो गई है। आज जनता के अंदर जागरूकता इस कदर ढल गई है कि पशु मेला जैसा पवित्र स्थल अतिक्रमण से अटा पड़ा हैं। पशु व्यापारी व पशु पालक दोनों वर्तमान की व्यवस्था से व्यथित हैं।