बलिया / बैरिया। जनपद में छठ पर्व के मद्देनजर तैयारियां शुरू हो गई हैं। व्रती महिलाएं अपने घरों की साफ सफाई शुरू कर दी हैं तो पुरुष गंगा घाटों, तालाबों की सफाई में जुट गए हैं। छठ को लेकर पूरा वातावरण देवीमय हो गया है। देवी के गीत घरों एवं दुकानों में बजने शुरू हो गए हैं। ऐसी मान्यता है कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। मान्यताओं के अनुसार, वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।
गौरतलब है कि यह पर्व मुख्य रूप से बिहार से जुड़ा माना जाता है। बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण छठ का महत्व द्वाबा में बढ़ जाता है। छठ से जुड़ी कई लोक कथाएं त्रेतायुग की घटनाओं पर आधारित है। इससे स्पष्ट होता है कि बिहारी समाज में छठ की परंपरा अत्यंत पुरानी है। लेकिन आज छठ व्रत का जो स्वरूप सामने है, वह काफी बदला हुआ है। तीन चार दशक पहले छठ का जो माहौल होता था, वह आज के माहौल से बिल्कुल मेल नहीं खाता। 1940, 50 के दशक में छठ व्रत के आयोजनों के गवाह बने लोग आज की चीजें देख विचलित हो जाते हैं। तब छठ की तैयारी करीब 15 से 20 दिन पहले ही शुरू हो जाती थी। कई दिन पहले गेहूं धोने व सुखाने का काम शुरू होता था। इस क्रम में कोई अवांछित व्यक्ति उसे न छू दे, इसका खास ध्यान रखा जाता था।