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पूजन का शुभ मुहुर्त सायं 6.02 से 7.5

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बलिया। सनातन धर्म में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से आरंभ होकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया तक चलने वाले पांच दिवसीय पर्व श्रृंखला का श्रीगणेश धनतेरस से होगा। दीपावली पंच कल्याण का पर्व है। इसे पांच दिनों के शृंखलाबद्ध कृत्यों द्वारा संपन्न किया जाता है। यह पर्व अमावस्या से दो दिन पूर्व और दो दिन बाद तक मनाया जाता है। यह बातें इंदरपुर निवासी आचार्य डा. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने कही।
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कहा कि शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि धनतेरस से दीपावली तक पूजा स्थान पर अखंड दीपक जलाने से एक वर्ष के लिए समस्त वास्तुदोष समाप्त हो जाते हैं। वहीं दीपावली से भैया दूज तक अखंड दीपक जलाने से उस घर में यम के दूत प्रवेश नहीं करते हैं। व्यापारी भी इसी दिन से नया बही खाता प्रारंभ करते हैं। बताया कि लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्वेतार्क गणपति की उपासना तथा गणपति मंत्र का जप करने से धन्य-धान्य, सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कमलगट्टे (कमलबीज) की माला से जाप करने एवं घृत (घी) की 108 आहुतियां देने से घर तथा व्यवसाय केंद्र में लक्ष्मी का वास होता है। कहा कि दक्षिणावर्ती शंख व चार स्वास्तिक बनाकर पूजा करने और लाल वस्त्र बांधने से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं। कुबेर यंत्र, लक्ष्मी माला, कनकधारा मंत्र आदि का प्रयोग लक्ष्मी प्राप्ति में सहायक माने गए हैं। दीपावली पूजन का मुख्यकाल प्रदोषकाल होता है। जिसमें स्थिर लग्न की प्रधानता होती है। अत: वृष, सिंह या कुंभ लग्न में दीपावली पूजन करना चाहिये। इस दिन वृष लग्न सायं 6.02 से 7.58 बजे तक है, जो दीपावली पूजन के लिए उत्तम है। इसके बाद अर्धरात्रि सिंह लग्न में कुबेर योग रात्रि 12.30 से 2.44 बजे तक दीपावली का पूजन होगा। इसके अलावा कुंभ लग्न में मध्याह्न 1.26 से 2.05 बजे तक गणेश व कुबेर आदि देवताओं का पूजन किया जा सकता है।
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