भोजपुरी के माटी से पूर्वांचल के ब्रम्हर्षि एवं गुरुजी के नाम से प्रचलित बैरिया के बलिहार गांव के किसान परिवार में जन्मे डॉक्टर कृष्ण बिहारी मिश्र को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजे जाने पर जनपद में हर्ष का माहौल है। तबीयत खराब होने के चलते वह पद्मश्री लेने के लिए कोलकाता से दिल्ली नहीं जा पाये। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य में रहकर शिक्षा पाने वाले डॉक्टर कृष्ण बिहारी मिश्र कोलकाता के हरि मोहन राय लेन में एक छोटे से मकान में आज भी सादगी से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कोलकाता के सियालदह मे बंगो वासी कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रह चुके है। अपनी लेखन की क्षमता से कई रचनाएं लिख चुके हैं।पद्म श्री मिलने के बाद बुधवार को अमर उजाला से खास बातचीत में श्री मिश्र ने बताया कि अभी 5 नवंबर 2017 को जन्मदिन परऽ सांझ की जम्हाई और सर्जनशील उजासऽ का लोकार्पण किया। कहने को तो हर भाषा से प्रेम है। उर्दू हिंदी और अपनी मातृभाषा से तो उनका प्यार सर्वाधिक है। उनकी छठवीं प्रकाशित पुस्तक पत्रकारिता का अनुशासन है। कहा कि पद्मश्री मिलना उनकी रचनाओं का सम्मान है। कृष्ण बिहारी मिश्र ने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं सरकारी गैर सरकारी विद्या प्रतिष्ठानों में शासवत प्रसंगों की सक्रिय भूमिका निभाई है। इन्हें ललित निबंधकार के रूप में इतिहास द्वारा स्वीकृत सम्मान भी मिल चुका है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा डिलीट की मानद उपाधि से प्रथम दीक्षांत समारोह से सम्मानित भी किया गया है। 2015 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण एवं महात्मा गांधी साहित्य सम्मान से भी सम्मानित किया गया। इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ रामकृष्ण परमहंस पर लिखे जाने वाले ऽकल्पतरु की उत्सव लीलाऽ नामक बहुचर्चित कृति पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है। यह आचार्य विद्यानिवास मिश्र सम्मान एवं डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।