बलिया। जिले में सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को सुधारने के लिए किए गए अब तक के सभी प्रयास फेल साबित हुए हैं। महीनों बाद भी राशन कार्डों के सत्यापन का काम शुरु नहीं हुआ। हालांकि पूर्ति विभाग ने कागजों में ही 65 फीसदी कार्डधारकों का सत्यापन कर शासन को रिपोर्ट भी भेज दी है। हैरानी की बात है कि यह आंकड़ा समय-समय पर तीन महीने में भेजा गया है। इस मामले की जानकारी होने पर इंटक के जिलाध्यक्ष विनोद कुमार सिंह ने खाद्य एवं रसद विभाग के आयुक्त व प्रमुख सचिव से शिकायत कर जांच की मांग की है।
जिले में कुल छह लाख 622 राशन कार्ड बने हैं। इसमें पात्र गृहस्थी के कुल चार लाख 98 हजार 921 व अन्त्योदय के कुल एक लाख एक हजार 701 हैं। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में पात्र गृहस्थी के कुल चार लाख 61 हजार 939 व शहरी क्षेत्रों में 36 हजार 982 तथा अन्त्योदय के ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 91 हजार 668 व शहरी क्षेत्रों में 10 हजार 33 हैं। मार्च 2016 में बने इस कार्ड में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने पर सरकार ने इसे संशोधित करने का फरमान जारी किया। लेकिन पूर्ति विभाग ने इसे दुरुस्त करने की आड़ मे नामों को काटने और जोडने का खूब खेल किया। प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद लोगों को उम्मीद जगी कि अब यह व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। बीते मई महीने में शासन ने राशन कार्डों को सत्यापन करते हुए अपात्रों के स्थान पर पात्रों को शामिल करने का निर्देश दिया। आलम यह रहा कि किसी भी गांव में सत्यापन का काम नहीं किया गया। इसको लेकर कई दिनों तक छात्र आंदोलन भी चला। हैरानी की बात है कि मौके पर भले ही सत्यापन नहीं हुआ लेकिन पूर्ति विभाग के दस्तावेजों में मई महीने में 20 फीसदी, जून में 20 फीसदी और जुलाई में 25 राशन कार्डों का सत्यापन कर शासन को रिपोर्ट भी भेज दी गई है।
उधर, इसकी जानकारी होने पर इंटक के जिलाध्यक्ष ने खाद्य एवं रसद विभाग के प्रमुख सचिव तथा आयुक्त को शिकायती पत्र देकर बताया है कि बैरिया, मुरलीछपरा, बेलहरी, रेवती, दुबहड़ आदि ब्लाकों में अभी तक सत्यापन का काम नहीं हुआ है। उन्होंने कागजों पर सत्यापन के मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
इनसेट...
सात सालों से बना हुआ है संकट
बलिया। जिले में वर्ष 2005 में ग्रामीण व शहरी इलाकों के लोगों को राशन कार्ड मुहैया कराया गया। कुल तीन तरह के राशन कार्ड बनाए गए थे जिसमें अन्त्योदय, बीपीएल व एपीएल कार्ड थे। कुल पांच लाख 85 हजार राशन कार्ड जिले में बने थे, इसमें एक लाख एक हजार 701 अन्त्योदय, एक लाख 61 हजार 16 बीपीएल व तीन लाख 22 हजार 283 एपीएल कार्डधारक थे। शासन के नियमों के मुताबिक राशन कार्ड की वैधता पांच साल की ही होती है लिहाजा वर्ष 2010 राशन कार्ड बनना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो सका और शासन लगातार वैधता बढ़ती रही। वर्ष 2014 में राशन कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरु हुई। लेकिन इसके बाद से लगातार नियम बदलते रहे और राशन कार्ड बनवाने के लिए लोग समय-समय पर आवेदन भी करते रहे। प्रक्रिया चल ही रही थी कि वर्ष 2015 में एनएफएसए (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) लागू करने का फरमान जिले में पहुंचा और एकबार फिर राशन कार्ड बनाने के लिए नए तरीके से प्रक्रिया शुरु हुई। पूर्ति विभाग की ओर से कार्डधारकों की फीडिंग कराई गई और शासन ने मार्च 2016 में सूची को ऑनलाइन प्रदर्शित किया तो बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई।
कोट
राशन कार्डों के सत्यापन के लिए प्रत्येक गांवों में पंचायत सचिवों की ड्यूटी लगाई गई है। ब्लाकों से मिली रिपोर्ट के आधार पर ही शासन को सूचना भेजी गई है। वर्तमान में 43 फीसदी से अधिक राशन कार्डों के सत्यापन की सूचना ब्लाकों से प्राप्त हुई है।
विनय कुमार, जिला पूर्ति अधिकारी