बलिया। नगर निकाय चुनाव में मतदाताओं को नगर पालिका या नगर पंचायत अध्यक्ष से काफी उम्मीदें होती हैं। हर चुनाव में वादे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद वादों को पूरा करने को लेकर तरह-तरह के बहानेबाजी करते हैं। लोगों की मानें तो चुनाव के वादे चुनाव तक ही सीमित रह जाते हैं।
पिछले चुनाव में जिले के दोनों के नगर पालिका व सात नगर पंचायतों के अध्यक्ष पद के प्रत्याशियों ने खासकर विकास व सफाई को मुद्दा बनाया था। लेकिन पांच साल बाद नगर पालिका व नगर पंचायतों की स्थिति ज्यों की त्यों रह गई। यहां तक नगर पालिका बलिया में तो विकास कार्य के टेंडर को लेकर खूब बवाल मचा और जिला प्रशासन को चार बार टेंडर प्रक्रिया को रोकना भी पड़ा। बीते पांच सालों में नगर पालिका बलिया में हुए विकास कार्यों देखें तो शहर की सड़कें खुद ही बयां कर रही हैं। आलम यह है कि अधिकांश सड़कों पर आज भी गड्ढे हैं और हल्की बारिश होने पर भी इन मार्गों पर चलना दूभर हो जाता है। सफाई का आलम यह है कि कोई भी नाला ऐसा नहीं है जिसमें कचरा न भरा हो जबकि इस मद में भारी भरकम धनराशि खर्च की जाती है। इस चुनाव में प्रत्याशियों की स्थिति तो अभी साफ नहीं है लेकिन दावेदारों की ओर से विकास, सफाई और अतिक्रमण को ही मुद्दा बनाया जा रहा है।
नगर पंचायत चितबड़ागांव के मुहल्ला राजेन्द्र नगर के किसान परमेश्वर सिंह ने कहा कि नगर पंचायतट में विकास के नाम पर केवल कोरम किया गया है। किसानों को कोई सुविधा नहीं मिली। बलिया नगर पालिका के आर्यसमाज रोड निवासी गार्मेन्ट कारोबारी विकास गुप्ता ने कहा कि वह पिछले तीन चुनावों से एक वादे सुन रहे हैं चुनाव बाद अध्यक्ष इसे संज्ञान में नहीं लेते। कहा कि अब जनता को इस बाबत सोचकर मतदान करना चाहिए। बलिया नगर पालिका के गुरुद्वारा रोड निवासी सुभद्रा ने कहा कि केवल चुनाव जीतने के लिए ही वादे होते हैं और चुनाव बाद चुने गए प्रतिनिधि जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं। कहा कि अध्यक्ष हो या सभासद सबका एक ही हाल है। विकास भवन कर्मचारी संघ मंत्री व शहर के निवासी अविनाश उपाध्याय ने कहा कि नगर पालिका कभी भी अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं करती इसके लिए चुने गए अध्यक्ष व सभासद ही जिम्मेदार होते हैं। चुनाव में किए गए वादे चुनाव तक सीमित रह जाते हैं। युवा व्यापारी सुनील परख की माने तो नगर निकाय चुनाव में नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई लेकिन अभी तक प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशी की घोषणा नहीं किया जाना सहीं नहीं है। आम जनता अनजान है कि उसके सामने अध्यक्ष पद के लिए कौन चेहरा आने वाला है। वोट देने से पहले उसे कैसे परखेगी।