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निजता का भंग होना भी उचित नहीं

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बलिया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया है। हालांकि सरकार ने निजता को मौलिक अधिकार न मानने की दलील थी। कोर्ट के इस फैसले पर बुद्धिजीवियों ने कहा है कि निजता का भंग होना भी उचित नहीं है।
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अधिवक्ता मनोज राय हंस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला संविधान के अनुरुप है। कोर्ट पहले भी यह स्पष्ट कर चुका है कि निजता की आड़ में मौलिक अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता है। बताया कि इस फैसले से वास्तव में आधार की अनिवार्यता को झटका लगेगा। कहा कि आधार एक ऐसा डाटा बेस है जिसमें नागरिक के पहचान से संबंधित सभी सूचनाएं एकत्र हैें। इस गंभीर दस्तावेज को जगह-जगह प्रर्दर्शित करने से एक ओर नागरिक की निजता भंग होना स्वभाविक है, जो मौलिक अधिकार का हनन है। सरकार को ऐसा दस्तावेज बनवाना चाहिए जिससे पारदर्शिता बनी रहे और किसी नागरिक की निजता भी भंग न हो।
सिविल कोर्ट के अधिवक्ता कंचन पांडेय ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत है, लेकिन उसे दूसरे पहलू को भी देखना चाहिए था। कहा कि इस फैसले के बाद लोग निजता की आड़ में एक नाम, कई काम का गोरखधंधा शुरु कर देंगे। निजता की आड़ में आधार का प्रयोग नहीं करेंगे। उधर, शहर के कृष्णा नगर निवासी राम सिंह ने कहा कि आधार की अनिवार्यता नहीं होने पर लोग पहले की तरह मनमाने तरीके से धन बटोरने का काम करेंगे। इससे कालाधन को जहां बढ़ावा मिलेगा। सिकंदरपुर क्षेत्र के लिलकर गांव निवासी व्यास देव ने कहा कि सरकार को विकल्प की तलाश करनी चाहिए ताकि नागरिक की निजता भंग न हो।
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