बहराइच। बाघ, हमारा राष्ट्रीय पशु जिसके नाम मात्र से ही दिल सहम जाता है। उसकी दहाड़ से मनुष्य थरथराने ही लगे।
इन्हें टीवी में ही देखकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं तो सोचिए अगर आपको अपनी आंखों से वास्तव में बाघों के रहन-सहन और चहलकदमी देखने को मिले तो उसका रोमांच कितना अद्भुत होगा।
जी हां, बाघों की दुनिया देखनी है तो बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं। बहराइच जनपद को ये सौभाग्य मिला है कि इसके अंतर्गत आने वाले कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में बाघों का निवास है।
यहां आइए और जंगल के राजा का राजसी ठाठ देखिए। यकीन मानिए आप जिंदगी भर इस अनुभव को भुला नहीं पाएंगे।
सबसे सुखद पहलू ये है कि यहां वन विभाग की सक्रियता और तराईवासियों की जागरूकता से बाघों की संख्या में इजाफा होने लगा है।
551 वर्ग किलोमीटर में फैले कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में वर्ष 2005 की मैनुअल गणना के मुताबिक बाघों की संख्या 40 के पार थी लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या घटकर वर्ष 2012 में 24 तक पहुंच गई।
फिर वन विभाग चेता, संरक्षण की कवायद तेज हुई तो 2014 में कैमरा ट्रैपिंग में बाघों की संख्या 36 पाई गई। वर्ष 2015 में वन विभाग ने फिर मार्च से जून तक कैमरा ट्रैपिंग करवाई।
अभी डाटा डाउनलोडिंग का कार्य चल रहा है अभी तक जो पिक्चर सामने आई है, उससे लग रहा है कि इस बार कतर्नियाघाट में बाघों की संख्या 50 के पार पहुंच जाएगी।
ये इस बात का सूचक है कि काफी हद तक हम बाघों को संरक्षित करने में सफल हुए हैं। आइए, आज वर्ल्ड टाइगर डे पर हम ये संकल्प लें कि बाघों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करेंगे।
नेपाल के बर्दिया में दहाड़ हे भारत के छह बाघ
डब्ल्यूडब्ल्यूआई (वर्ल्ड वाइल्ड इंस्टीट्यूट) देहरादून के मुताबिक वर्ष 2014 में कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के छह बाघ खाता कारीडोर के रास्ते नेपाल के रायल बर्दिया नेशनल पार्क पहुंच गए थे। यह बाघ अब तक नहीं लौटे हैं।
हालांकि, नेपाल में भी कैमरा ट्रैपिंग चल रही है। वहां के ट्रैपिंग से मिलान के बाद ही बाघों के सही स्थिति की जानकारी मिल सकेगी।
टाइगरों को बचाने के लिए प्रवास सुरक्षा जरूरी
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के प्रभागीय वनाधिकारी आशीष तिवारी ने बताया कि टाइगर का अस्तित्व उनके प्रवास स्थल पर निर्धारित होता है।
टाइगर की होम रेंज और टेरीटरी होती है। होम रेंज वह इलाका है, जिसमें बाघ और बाघिन प्रवास करते हैं, जबकि टेरीटरी का उपयोग शिकार के लिए किया जाता है।
एक बाघ और बाघिन 12 से 15 किलोमीटर की टेरीटरी में शिकार करते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक बाघिन सुरक्षित नहीं होगी तब तक वह प्रजनन के लिए तैयार नहीं होगी।
हिरनों की संख्या बढ़ाने की भी चल रही कवायद
बाघों को जब तक समुचित आहार नहीं मिलेगा, तब तक वह आबादी की ओर भागते रहेंगे। उन्हें समुचित आहार मुहैया कराने के लिए हिरनों की आबादी निरंतर बढ़ाई जा रही है।
हिरन का प्रजनन काल बरसात का महीना होता है। इसी के चलते जून और फरवरी में जंगल के ग्रासलैंड की जोताई करवाई जाती है, जिससे कि हिरन को घास मुहैया हो सके।
तीन गैंग सक्रिय थे, पहुंचे जेल
डीएफओ आशीष तिवारी ने बताया कि बाघों की शिकार के लिए हरियाणा, राजस्थान और पंजाब के शिकारी पूर्व में कतर्नियाघाट आते थे। इनमें हरियाणा का प्रताप नाम का शिकारी काफी सक्रिय था।
वह कतर्नियाघाट क्षेत्र में सक्रिय स्थानीय शिकारियों के भरोसे बाघों को निशाना बनाते थे। इनमें कल्लू, तेजपाल मौर्या और राजकुमार गैंग सक्रिय था।
कल्लू गैंग पथारगौढ़ी जंगल प्रतापपुर मटेरा और लखीमपुर जंगल से सटे इलाकों में शिकार करता है। वहीं तेजपाल का इलाका नौबना, मुर्तिहा का था, जबकि रामकुमार पृथ्वीपुरवा के आसपास शिकार को अंजाम देता था।
इन तीनों पर शिकंजा कसकर उन्हें जेल भेजा गया। जिसके चलते 2013 से अब तक बाघ की शिकार की वारदातें सामने नहीं आई हैं।
जागरूक हुए लोग
बाघ और तेंदुओं के हमले के दौरान मानव वन्यजीव संघर्ष की वारदातें बढ़ने की संभावना रहती हैं लेकिन साल भर से लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
बाघ और तेंदुओं का मूवमेंट मिलने पर वन विभाग को सूचित किया जाता है। अगर हमला होता है तो तत्काल वनाधिकारी पहुंचकर मदद करते हैं। इससे सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा मिला है।
नेपाल से भी स्थापित हुआ समन्वय
कतर्नियाघाट सेंक्चुरी नेपाल के रायल बर्दिया नेशनल पार्क से खाताकारीडोर के माध्यम से जुड़ा हुआ है। जिसके चलते नेशनल पार्क नेपाल के वन्यजीव कतर्निया और कतर्नियाघाट के वन्यजीव नेपाल पहुंच जाते हैं।
उनकी सुरक्षा और संरक्षा के लिए पखवारे भर पूर्व वनाधिकारियों के साथ बैठक हुई थी। 30 जुलाई को पुन: निचले स्तर के अधिकारियों की बैठक करवाई जा रही है। जिससे कि बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।