'अपनी तारीख का उनवान (शीर्षक) बदलना है तुझे, उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे'। प्रदेश की स्वास्थ्य सखियों ने ऐसा करके दिखाया है। बीते कई साल में उन्होंने न सिर्फ आत्मनिर्भर बनने की कोशिश की है बल्कि अपने परिवार व समाज के स्वास्थ्य व्यवहार को भी मजबूत की हैं।
लखनऊ के उदेतखेदा निवासी स्वास्थ्य सखी मीना देवी (37) के पति दिहाड़ी मजदूर हैं। चार बेटियों व एक बेटे के परिवार का खर्च पूरा न होने पर मीना ने गौपालन, कंपोस्ट खाद, उपले बनाने का काम किया। वह वर्ष 2021 में स्वास्थ्य सखी बन गईं।
राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (यूपीएसआरएलएम) से खाद्य-पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता विषय पर प्रशिक्षण प्राप्त किया। मीना अपने कार्य के 10 दिनों में रोजाना चार घरों का भ्रमण करती हैं। इस दौरान गर्भवती, धात्री व 0-24 माह के बच्चों को स्तनपान और छह माह से ऊपर के बच्चों की माता को ऊपरी आहार के बारे में समझाती हैं।
सुलतानपुर की स्वास्थ्य सखी सुदामा देवी (39) के प्रयासों से उनके गांव परऊपुर में काफी बदलाव हुए हैं। गांव में स्वास्थ्य संसाधनों की पहुंच बनीं। सुदामा ने ग्रामीणों की भ्रांतियों को दूर किया। आज गांव के लोग कुपोषण, टीकाकरण, स्तनपान, माहवारी जैसे विषयों पर बात करते हैं। गांव में जांच, टीकाकरण और संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी हुई है, वहीं कुपोषण में कमी आई है। सुदामा परिवार की मदद के लिए बकरी और भैंस पालन करती है। इससे वह अपने तीनों बच्चों को पढ़ा रही है।
जालौन के अगवापुर इटौरा गांव की स्वास्थ्य सखी बिंदिया (42) ने गांव में कुपोषण दूर करने का काम किया है। वह सभी 10 समूह की लक्षित गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं व 6 माह से 2 वर्ष के बच्चों की सूची बनाकर उनको माड्यूल के अनुसार भोजन के लिए समझाती हैं।
इससे उनके पोषण में सुधार हो रहा है। वह सेनेटरी पैड मंगवाकर गांव में बेचती हैं, जिससे मासिक धर्म स्वच्छता में परिवर्तन आ रहा है। वहीं, इसकी आमदनी से घर खर्च भी चल जाता है। बिंदिया ने बताया कि प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पोषाहार वितरण, पेंशन, आवास आदि का लाभ भी गांव वालों को मिल रहा है। गांव की ज्यादातर महिलाएं समूहों से जुड़ गईं हैं, वे लोन लेकर रोजगार व खेतीबाड़ी के जरिये परिवार की मदद कर रही हैं।