बहराइच। नेपाल से निकलकर कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के बीच से बहने वाली गेरुआ नदी एक बार फिर दुर्लभ जलीय जीवों के लिए नई उम्मीदें जगा रही है। नदी के विभिन्न टापुओं पर इस वर्ष मादा घड़ियालों ने 26 घोंसले (नेस्ट) बनाकर अंडे दिए हैं। पिछले वर्ष यह संख्या 24 थी। घड़ियालों के इन घोंसलों को सुरक्षित रखने के लिए अब वन विभाग की टीम ने पहरा बढ़ा दिया है।
कतर्नियाघाट सेंचुरी अपने दुर्लभ वन्यजीवों के साथ-साथ जलीय जीवों के लिए भी पर्यटन मानचित्र पर विशेष पहचान रखती है। गेरुआ नदी गंगेटिक डॉल्फिन, मगरमच्छ और कछुओं का प्राकृतिक आश्रय स्थल है। हर साल मार्च और अप्रैल के बीच मादा घड़ियाल इन शांत टापुओं पर घोंसले बनाती हैं। वन विभाग ने उन टापुओं को चिह्नित कर लिया है जहां घोंसले मिले हैं, ताकि अंडों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।
कतर्नियाघाट के डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया कि सीमेंट टावर के सामने वाले टापू और अन्य स्थानों पर घोंसलों की निगरानी लगातार की जा रही है। उम्मीद है कि 15 जून के आसपास इन अंडों से बच्चे निकलेंगे और घड़ियालों का नया कुनबा नदी के पानी में अठखेलियां करता नजर आएगा।
-
टापुओं पर पर्यटकों पर रोक, तीन टीमें कर रहीं निगरानी
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया कि इस वर्ष 26 स्थानों पर मादा घड़ियालों द्वारा घोंसले (नेस्ट) बनाने की पुष्टि हुई है। इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी मानवीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए टापू क्षेत्र में आम लोगों और पर्यटकों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। घोंसलों की सुरक्षा के लिए तीन विशेष टीमें लगातार निगरानी कर रही हैं। वनकर्मी और नाविक सुबह-शाम गश्त कर रहे हैं ताकि घड़ियालों का यह कुनबा पूरी तरह सुरक्षित रहे।
-
घड़ियाल सेंटर के विशेषज्ञों ने भी डेरा डाला
गेरुआ नदी के टापुओं पर मादा घड़ियालों द्वारा बनाए गए 26 घोंसलों की सुरक्षा के साथ-साथ अब उनके वैज्ञानिक अध्ययन पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए लखनऊ के कुकरैल घड़ियाल सेंटर से विशेषज्ञों की एक टीम बुलाई गई है। ये विशेषज्ञ कतर्नियाघाट में घड़ियालों के प्रजनन की स्थिति, अंडों के रखरखाव और वहां की पारिस्थितिकी का अध्ययन कर रहे हैं।
-
पिछले साल भी हुए थे 200 नन्हे घड़ियाल रेस्क्यू
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्ष घोंसले खुलने पर लगभग 200 नन्हे घड़ियालों को बचाया गया था। इनमें से कई बच्चे अपनी मां के साथ प्राकृतिक रूप से नदी में चले गए, जबकि टापू पर सुरक्षित रह गए बच्चों को कतर्नियाघाट घड़ियाल संरक्षण केंद्र में आश्रय दिया गया। इस बार भी अंडों से बच्चे निकलने के समय को देखते हुए विभाग ने वैसी ही तैयारियां की हैं।