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अंग्रेजों ने दी यातनाएं पर नहीं झुके मुस्तफा

Fri, 14 Aug 2015 10:43 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
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गुलामी की बेड़ियों से जकड़े भारत को आजाद कराने के लिए हर एक शख्स में छटपटाहट थी, फिर चाहे वह हिंदू रहा हो या मुसलमान। आजादी के दीवानों ने कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। इस कड़ी में जमुनहा बाजार निवासी मौलवी मुस्तफा खां ने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका था।
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तत्कालीन अविभाजित बहराइच जिले के जमुनहा बाजार निवासी रमजान खां के घर वर्ष 1911 में मुस्तफा का जन्म हुआ। मुस्तफा महात्मा गांधी के अहिंसावादी विचारों से काफी प्रभावित थे। मुस्तफा सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े। वर्ष 1941 में मुस्तफा पर सौ रुपये का जुर्माना ठोंका गया और एक वर्ष की कठोर कारवास की सजा दी गई। रिहा होने के बाद मुस्तफा खां पूरे दमखम से फिर अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उतरे। इस दौरान वर्ष 1942 में उन्हें नौ माह की कड़ी कैद की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों ने तमाम यातनाएं दीं। आखिरकार मुस्तफा की मेहनत रंग लाई। 15 अगस्त वर्ष 1947 को जब लाल किले की प्रचीर पर तिरंगा फहराया गया तो उनका सीना गर्व से ऊंचा हो उठा। वर्ष 1981 में मौलवी मुस्तफा खां स्वर्गवासी हो गए।
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