रिसिया। पराली की समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए बहराइच जिले ने मिसाल पेश की है। रिसिया में पराली से फ्यूल ब्रिकेट और प्लेट बनाया जा रहा है। यहां तैयार प्लेट को एनटीपीसी ऊंचाहार को बेचा जा रहा है, जिससे प्रतिदिन बिजली उत्पादन हो रहा है।
वर्ष 2022 में स्थापित यह प्रदेश का पहला सफल पराली निस्तारण संयंत्र बन गया है। यहां किसानों से धान की पराली, गन्ने की पत्तियां, मक्के का डंठल और अन्य कृषि अवशेष 2000 से 3000 रुपये प्रति टन के हिसाब से खरीदे जाते हैं।
प्रोसेसिंग के बाद तैयार फ्यूल प्लेट की आपूर्ति एनटीपीसी ऊंचाहार, देवा (बाराबंकी) स्थित सीबीजी प्लांट और गोरखपुर इकाई को की जा रही है। यहां अब तक सौ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल चुका है। पराली जलाने वाले किसान भी अब इससे अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।
प्लांट के प्रबंध संचालक और उत्तर प्रदेश बायोमास ब्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रामरतन अग्रवाल को प्रदेश में पराली मैन के नाम से जाना जाता है। उन्हें वर्ष 2022 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्मानित भी किया जा चुका है। उनकी पहल पर प्रदेश में अब तक 400 से अधिक बायोमास आधारित इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं।
उन्होंने बताया कि यह मॉडल अब दिल्ली, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में भी अपनाया जा रहा है, जहां पराली जलाने से हर साल भारी प्रदूषण फैलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर बढ़ावा मिला तो पराली से होने वाले धुएं की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। सरकार भी अब बायोमास आधारित ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।
गोरखपुर और देवा (बाराबंकी) में स्थापित सीबीजी प्लांट में प्रतिदिन सात लाख क्विंटल पराली और एक लाख क्विंटल गोबर प्रोसेस कर बायोगैस भी तैयार की जा रही है। इसका उपयोग वाहनों व उद्योगों में ईंधन के रूप में किया जा रहा है। इससे किसानों को लाभ हो रहा है। प्रदूषण भी कम हो रहा है।
राज्य सरकार ने परियोजना को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य जीएसटी में दस वर्षों की छूट और पूंजीगत लागत पर 25 प्रतिशत अनुदान भी उपलब्ध कराया है। आगामी समय में शाहजहांपुर, पीलीभीत, बस्ती, अयोध्या और गोरखपुर में भी बायोकोल संयंत्र स्थापित करने की तैयारी चल रही है।