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नेपाल के गैंडों को रास आ गया कतर्निया का जंगल

Sat, 23 Apr 2016 10:03 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के कतर्नियाघाट रेंज स्थित ग्रासलैंड में विचरण करता गैंडा। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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बहराइच/बिछिया। कतर्नियाघाट सेंक्चुरी आने वाले पर्यटक अब गैंडे भी देखकर रोमांचित हो रहे हैं। ये गैंडे आए हैं नेपाल के रायल बर्दिया नेशनल पार्क से। इन्हें अब कतर्नियाघाट का जंगल रास आ रहा है और वे यहीं के होकर रहे गए हैं।
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गेरुआ पार ग्रासलैंड में इस समय पांच गैंडों का मूवमेंट मिल रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो कतर्नियाघाट के गेरुआ पार के जंगल की आबोहवा गैंडों के अनुकूल है। 

नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र को बाघ, तेंदुओं तथा हाथियों के लिए जाना जाता है। लेकिन, यहां कुछ दिनों से गैंडों का मूवमेंट गेरुआ पार के जंगल में दिख रहा है। इस समय गेरुआ नदी सूख गई है।
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ऐसे में घने जंगल के बीच रहने वाले यह गैंडे ग्रासलैंडों में भी दिखाई पड़ रहे हैं। शनिवार को गेरुआ सफारी में भ्रमण के लिए पहुंचे कई पर्यटकों ने जब नदी पार के ग्रासलैंड में गैंडे को विचरण करते देखा तो सभी रोमांचित हो उठे।

मौके पर मौजूद वन रक्षक कबीरुल हसन ने गैंडा परिक्षेत्र में न जाने की हिदायत भी दी। पहली बार गैंडा सामान्य तरीके से ग्रासलैंड में दिखाई पड़ा। इसे वनाधिकारी भी काफी सुखद मान रहे हैं। 

कतर्नियाघाट के प्रभागीय वनाधिकारी आशीष तिवारी का कहना है कि एक साल पहले चार गैंडों का मूवमेंट मिलता था लेकिन इधर कुछ दिनों से पांच गैडे गेरुआ पार के चूही पाताल जंगल और उससे सटे ग्रासलैंडों में दिखायी पड़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि कतर्नियाघाट सेंक्चुरी वर्ष 1997 से रास आ रहा है। खाता कारीडोर के रास्ते गैंडों का झुंड अक्सर कतर्नियाघाट आता था और फिर वापस लौट जाता था लेकिन वर्ष 2002 के बाद से गैंडों का ठहराव भी होने लगा है। उन्होंने कहा कि इस समय तीन वयस्क व दो शिशु गैंडे गेरुआ पार के कतर्निया जंगल में प्रवास कर रहे हैं। 

रेडियो टैग लगे गैंडे का हर दो-तीन महीने पर होता है मूवमेंट 

डीएफओ आशीष तिवारी ने बताया कि रॉयल नेशनल बर्दिया पार्क के एक गैंडे में रेडिया टैग लगा हुआ है। इसके जरिए जीपीएस सिस्टम के माध्यम से गैंडे के मूवमेंट पर वनकर्मियों की नजर रहती है। प्रत्येक दो से तीन महीने पर यह गैंडा रायल बर्दिया नेशनल पार्क से कतर्निया के जंगलों में पहुंचता है और फिर वापस चला जाता है। 

गैंडों के अनुकूल है जंगल

डीएफओ ने बताया कि गेरुआ पार घने जंगल के बीच छोटे-छोटे तालाब है, जिनमें शैवाल, कवक व मुलायम घासें हैं। गैंडा पूरी तरह शाकाहारी होता है। शैवाल उसकी विशेष पसंद होती है। गेरुआ पार के जंगल की आबोहवा के चलते ही तीन वयस्क व दो शिशु गैंडों का ठहराव जंगल में बना हुआ है। यूं कहें कि वह कतर्नियाघाट के होकर रह गए हैं तो गलत नहीं होगा।
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