बहराइच। हजरत अली की शहादत की याद में गुरुवार को मजलिसों का आयोजन हुआ। इसके बाद हैदर मौला की सदाओं से शहर गूंज उठा।
21वीं रमजान का कदीमी जुलूस परंपरागत मार्गों से होता हुआ कर्बला पहुंचा। इस दौरान नौहाख्वानी और सीनाजनी भी की गई, जिससे माहौल गमगीन रहा।
पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के दामाद हजरत अली की शहादत 21वीं रमजान को हुई थी। उनकी याद में गुरुवार सुबह से ही शहर में जगह-जगह मजलिसों का सिलसिला शुरू हुआ।
शाम चार बजे शिया समुदाय के बच्चे, बूढ़े, जवान सभी शिया जामा मस्जिद पहुंचे। यहां सैयद सगीर आबिद ने अलविदाई मजलिस को संबोधित किया।
शिया समुदाय के फिदा अब्बास ने बताया कि मजलिस में जब हजरत अली की दर्दनाक शहादत का वाकया बयां किया गया तो मौजूद लोग फफक उठे।
मजलिस खत्म होने के सबीहे ताबूत बरामद किया गया। यहां से जुलूस की शुरुआत हुई। इस दौरान हैदर मौला की सदाओं से शहर गूंज उठा।
यह जुलूस घंटाघर, छावनी, चांदपुरा होते हुए देर शाम कर्बला पहुंचा। जुलूस में शामिल लोग नौहा पढ़ रहे थे। कुछ अकीदतमंद सीनाजनी करते हुए शोक जता रहे थे।
कर्बला में जुलूस का समापन हुआ। वहां पर नमाजे मगरिब पढ़ाई गई। इसके बाद रोजा इफ्तार हुआ। हजरत अली की शहादत के चलते जुलूस में शामिल सभी लोग काले कपड़ों में नजर आए।
जुलूस में शामिल सबीहे ताबूत मौला-ए-कायनात की जियारत के लिए सड़क के दोनों तरफ महिलाएं व अन्य अकीदतमंद खड़े थे। कड़ी सुरक्षा के बीच जुलूस का समापन हुआ।