बहराइच। मोहर्रम का चांद दिखते ही बुधवार को इमामबाड़े या हुसैन की सदाओं से गूंज उठे। मोहर्रम का पहला अगुवानी जुलूस नगर में देर शाम को गमगीन माहौल में परंपरागत मार्गों से निकाला गया। इसमें काफी संख्या में शिया समुदाय के लोग शामिल हुए।
मोहर्रम का चांद दिखते ही गम का महीना माहे मोहर्रम की शुरुआत हो गई। महिलाओं ने अपने मजलूम इमाम के गम में सुहाग की प्रतीक चूड़ियां उतार दीं। महिलाएं और पुरुष सभी काले कपड़े पहनकर शोक में डूब गए। चांद रात को महिलाओं ने नौहा पढ़ा।
इसी के साथ दो माह आठ दिन की अजादारी का आगाज हो गया। मांगलिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी प्रतिबंध लग गया। शिया बाहुल्य क्षेत्रों में या हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। घर अजाखानों में परिवर्तित हो गए हैं।
पहले दिन देर शाम गमगीन माहौल में अगुवानी जुलूस परंपरागत मार्गों से निकाला गया। फिदा अब्बास ने बताया कि इस जुलूस में शामिल होने के लिए काफी संख्या में काले कपड़े पहने शिया समुदाय के लोग शाम को कर्बला पहुंचे।
बाद नमाज मगरिब कर्बला से जुलूस निकला गया। जुलूस में शामिल लोग नौहा व मातम करते हुए चल रहे थे। जुलूस में शामिल लोग इस्लामी चिह्न अलम को उठाए हुए थे। जैसे ही कर्बला से जुलूस निकला तो लोग अलम की जियारत करने के लिए सड़क के दोनों ओर जमा हो गए।
यह जुलूस बशीरगंज, पुलिस चौकी, काजीपुरा, सैयदबाड़ा होते हुए इश्तियाक हुसैन के घर पर पहुंचकर समाप्त हुआ। इसके बाद मजलिस हुई। जुलूस में शांति के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद रहे। जुलूस के परंपरागत मार्गों पर इस दौरान कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रही।