मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पांडवों ने बगेश्वरनाथ में तपस्या की थी। यहां स्थापित वट वृक्ष अति प्राचीन है। मंदिर के बगल में पुराना सरोवर भी है। कहा जाता है कि यहां पर जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से न सिर्फ मन को शांति मिलती है बल्कि सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
पयागपुर में गंगवल मार्ग पर स्थित बगेश्वरनाथ शिव मंदिर में प्रत्येक सोमवार को मेला लगता है। सावन मास में तो प्रतिदिन मेले जैसा माहौल होता है। क्षेत्र के बुजुर्ग रघुनाथदास का कहना है कि उनके पूर्वज बताते थे कि अज्ञातवास के समय जब पांडव एक साल का समय छिपकर गुजार रहे थे, तब सभी ने बगेश्वरनाथ में ही तपस्या की थी।
यहां पर शिवलिंग की स्थापना कर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी। उन्होंने बताया कि बहुत पहले यहां जंगल होता था। चरवाहों को शिवलिंग दिखाई पड़ा था। पूजा अर्चना शुरू हुई। लोगों ने मन्नतें मांगी। मन्नत पूरी हुई तो आस्था का सैलाब उमड़ने लगा। मंदिर का जीर्णोद्धार 150 वर्ष पूर्व पयागपुर राजघराने की ओर से कराया गया था। इसका हवाला बहराइच के गजेटियर में भी मिलता है।
यह मंदिर पुरानी लाखौरी ईंटों से बना है। दो वर्ष पूर्व समाजसेवी अवध बिहारी शुक्ल ने मंदिर का रंग रोगन और मरम्मत करवाया। मंदिर में नेपाल, गोंडा, बलरामपुर, लखनऊ, बाराबंकी समेत आसपास जिलों से श्रद्धालुओं का तांता उमड़ता है।