बहराइच। जिन खेतों में हम अब तक गेहूं व धान जैसी फसलों को देखने के आदी हैं अगर वहां से मगरमच्छों की नई पीढ़ी वजूद में आने लगे तो इसे अजूबा ही कहा जाएगा।
लेकिन, जलीय जंतु की प्रकृति में आ रहे परिवर्तन की यह आश्चर्यजनक घटना कतर्नियाघाट के गंगापुर गांव के निकट सामने आई है।
नदी किनारे किसी टापू को अपनी सृजनस्थली बनाने की बजाय मादा मगरमच्छ ने यहां के एक खेत की मेड़ को अपनी नई पीढ़ी की आमद के लिए ज्यादा मुफीद जगह माना।
मेड़ में बनाए गए मगरमच्छ के घोंसले से बुधवार रात 30 नन्हें मगरमच्छ निकले। वन विभाग की टीम पहली बार खेत में मगरमच्छ के प्रजनन से हतप्रभ है। नेस्ट से निकले नन्हें घड़ियालों की सुरक्षा के लिए टीम लगाई गई है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के गेरुआ और कौड़ियाला नदियों में लगभग 350 की संख्या में वयस्क घड़ियाल और 260 मगरमच्छ पाए जाते हैं।
मगरमच्छ और घड़ियाल का प्रजनन काल 15 जून से 15 जुलाई के मध्य होता है। यह जलीय जीव 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्य नदी के टापू पर बालू में नेस्ट बनाकर अंडे सहेजते हैं।
लेकिन, मगरमच्छ द्वारा नदी और नाले से हटकर खेत की मेड़ में नेस्ट बनाने का मामला ककरहा रेंज में प्रकाश में आया है। जहां पर मगरमच्छ का घोंसला मिला है उससे कुछ दूरी पर बबया नाला है। झाड़ियां और जंगल भी हैं।
इसी स्थान पर खेत की मेड़ में गुरुवार सुबह गड्ढे में ग्रामीणों ने काफी संख्या में मगरमच्छ के बच्चे देखे तो चौंक गए। तत्काल वन विभाग को सूचना दी गई।
डीएफओ आशीष तिवारी के निर्देश पर ककरहा वन क्षेत्राधिकारी विकास अस्थाना टीम के साथ मौके पर पहुंचे तो उन्हें मगरमच्छ का नेस्ट खेत की मेड़ में मिला। मगरमच्छ के 30 बच्चे जीवित मिले। पास में ही अंडे फूटे पड़े थे।
डीएफओ का कहना है कि रात में मादा ने प्रजनन काल पूरा किया है। उसके बाद अंडों से बच्चे निकले हैं। उन्होंने कहा कि नदी और नाले से हटकर खेत की मेड़ पर मगरमच्छ के प्रजनन का यह पहला मामला है।
फिलहाल, मादा मगरमच्छ आसपास ही होगी, इसके चलते कुछ दूरी पर वन विभाग की टीम को मुस्तैद किया गया है। ग्रामीणों का आवागमन रोक दिया गया है, जिससे कि मादा बच्चों को सुरक्षित नदी या नाले की ओर ले जा सके।