बहराइच। किसान पीजी कॉलेज में सीमा जागरण मंच व संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में शनिवार को दूसरे दिन देश-विदेश के बुद्धिजीवियों ने थारू जनजाति के विकास पर चर्चा की। इस दौरान सामने आया कि भारत की तरह नेपाल और भूटान भी थारुओं के विकास के लिए संवेदनशील हैं। इन्हें मुख्य धारा में जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं। विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक को सेमिनार के निष्कर्ष और सुझाव को सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी।
नेपाल के महेंद्र बहुमुखी कैंपस की समाजशास्त्र की प्रवक्ता कृष्णा पांडेय ने कहा कि थारू संस्कृति मातृ शक्ति की प्रतीक है। नेपाल में लगभग 18 लाख थारू जनजाति निवास करती है।
सबसे ज्यादा थारू नेपाल के बर्दिया जिले में हैं। इस समुदाय में महिलाओं का दबदबा रहता है। महिलाएं परिश्रमी होने के साथ रचनात्मक भूमिका निभाती हैं। इनकी प्रतिभा को प्रोत्साहन मिले तो यह अपनी आर्थिक दशा सुधार सकेंगी।
ग्यालपोजिंग कॉलेज ऑफ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (जीसीआईटी) भूटान के प्रोफेसर लह्यतो जांबा का मानना है कि थारू जनजाति का विकास हो, लेकिन उनकी संस्कृति से छेड़छाड़ न की जाए।
थारू जंगलों के बीच रहना चाहते हैं तो उन्हें वहीं रहने दिया जाए। वह यदि जंगल की जड़ी-बूटियों से औषधि बनाते हैं तो उन्हें उसी क्षेत्र में प्रोत्साहित करें। उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संरचना में बदलाव के बगैर विकास की योजना तैयार की जाए।
यह समुदाय पर्यावरण प्रेमी है, तो इस मनोवृत्ति को उसी क्षेत्र में विकसित होने दी जाए। इसलिए इस समुदाय के विकास का अलग दृष्टिकोण होना चाहिए। इन्हें शैक्षिक और आर्थिक रूप से विकसित करना जरूरी है। इसके बाद अपने विकास का रास्ता यह समुदाय स्वयं निकाल लेगा।
सेमिनार में संघ के प्रांत प्रचारक ने थारू विकास के लिए बाबा गोरखनाथ यात्रा से लेकर अन्य प्रयासों का उल्लेख किया। प्रोफेसर एमएल ब्रह्मभट्ट ने वन नीति को लागू करने पर चर्चा की। जनजाति विकास मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय बहादुर चौधरी ने राजनीतिक भागीदारी को विकास के लिए आवश्यक बताया।