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Bahraich: कतर्नियाघाट की रहस्यमयी ‘मोगली गर्ल’ एहसास का 18 साल की उम्र में निधन, असली पहचान अनसुलझी

Fri, 19 Jun 2026 11:45 PM IST
लखनऊ ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, बहराइच

सार

जंगल के पास बंदरों के बीच मिली रहस्यमयी बच्ची की कहानी उसकी मौत के साथ भी अनसुलझी रह गई। वर्षों तक उसके पुनर्वास, इलाज और पहचान की तलाश की गई, लेकिन उसके परिवार, मूल निवास और जंगल तक पहुंचने की सच्चाई कभी सामने नहीं आ सकी। उसकी कहानी आज भी लोगों को भावुक करती है।
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बहराइच के जंगल में मिली थी मोगली गर्ल एहसास।
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विस्तार
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जनवरी 2017 की वह सर्द सुबह आज भी लोगों के जेहन में ताजा है...। बिछिया-बहराइच मार्ग पर कतर्नियाघाट के जंगल से निकले बंदरों के झुंड के बीच एक रहस्यमयी बच्ची दिखाई दी थी। चार पैरों पर चलने वाली, इंसानों से भय खाने वाली और जानवरों जैसी आवाजें निकालने वाली उस बच्ची को दुनिया ने मोगली गर्ल के नाम से जाना। गत सोमवार को 18 साल की उम्र में लखनऊ में उसकी मौत हो गई। इससे उसकी जिंदगी से जुड़ी कहानी अनसुलझी ही रह गई।

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मोगली गर्ल जब मिली थी तब वह महज एक मासूम बच्ची थी। जिला अस्पताल बहराइच में चार दिन तक भर्ती रहने के दौरान भी उसका व्यवहार सामान्य बच्चों जैसा नहीं हो पाया। इसके बाद उसे लखनऊ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने उसका नाम पूजा रखा, जबकि बाद में मोहन रोड स्थित निर्वाण राजकीय बाल गृह विशेषीकृत में उसे नया नाम एहसास मिला। धीरे-धीरे वह मोगली गर्ल से एहसास बन गई, लेकिन उसकी असली पहचान कभी सामने नहीं आ सकी।

सबसे बड़ा सवाल यह बना रहा कि वह बच्ची आखिर आई कहां से थी। उसका परिवार कौन था। वह कतर्नियाघाट के जंगलों तक कैसे पहुंची। जंगल में उसने अपना जीवन कैसे बचाए रखा। इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं और विशेषज्ञों ने वर्षों तक प्रयास किए, लेकिन कोई ठोस सुराग नहीं मिला।
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कतर्नियाघाट फ्रेंड्स क्लब के कार्यकारी अध्यक्ष बीडी लखमानी कहते हैं कि मोगली गर्ल केवल एक बच्ची नहीं, बल्कि जंगल और मानव जीवन के बीच मौजूद एक अद्भुत रहस्य थी। वहीं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से जुड़े वन्यजीव विशेषज्ञ दबीर हसन के अनुसार, मोगली गर्ल एक ऐसी पहेली थी, जिसके हर जवाब के पीछे एक नया सवाल खड़ा हो जाता था।

नौ वर्षों तक पुनर्वास, इलाज और सामाजिक जीवन से जोड़ने के प्रयास चलते रहे, लेकिन उसकी कहानी का सबसे अहम हिस्सा उसकी वास्तविक पहचान हमेशा अंधेरे में ही रही। अब उसकी मौत के बाद बहराइच, कतर्नियाघाट और वन्यजीव जगत से जुड़े लोगों की आंखें नम हैं।

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