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सुविधाओं से वंचित शहीद के परिवारीजन

Tue, 25 Jul 2017 10:49 PM IST
अमर उजाला/बहराइच
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शहीद बलिकरन - फोटो : अमर उजाला
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सैनिक सदैव ही रणभूमि में अपने पराक्रम व शौर्य का प्रदर्शन करते रहे हैं। हजारों सैनिकों ने रणभूमि में अपना बलिदान देकर सीमाओं की रक्षा की व दुश्मन को मार भगाया। कारगिल में ऐसी ही संघर्ष गाथा के गवाह बने थे सूबेदार बलिकरन सिंह। उन्होंने दुश्मनों का मुकाबला करते हुए 28 मई 1999 को कारगिल में शहादत पाई, लेकिन इस शहीद की शहादत का मूल्य सरकार ने चंद सिक्कों में तौल दिया। शहीद के परिवारीजन आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। 
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हुजूरपुर क्षेत्र के त्रिकोलिया गांव में वर्ष 1971 में जन्मे बलिकरन सिंह 1951 में 23 राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुए। सेना में नौकरी के दौरान देश के अनेक प्रांतों में उनकी तैनाती हुई, जहां उन्होंने सदैव देश विरोधी तत्वों का मुंहतोड़ जवाब दिया।

वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान बलिकरन सिंह की तैनाती कश्मीर प्रांत के बटालिक क्षेत्र में थी। यह बलिकरन सिंह के लिए सुनहरा मौका था, जब वे साबित कर सकते थे कि वे भारत मां के सच्चे सपूत हैं। पाकिस्तान के नापाक इरादों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए रायफल्स ने युद्ध स्थल पर मोर्चा संभाला।
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मोर्चे पर डटे बहादुर बलिकरन ने अकेले ही कई शत्रुओं को ढेर कर दिया। सामने से होती भीषण गोलीबारी के बावजूद बलिकरन का उत्साह कम नहीं हुआ। आखिरकार कारगिल की चोटी पर दुश्मनों से लड़ते-लड़ते यह भारत माता का लाडला 28 मई 1999 को शहीद हो गया।

इस रणबांकुरे ने अपने परिवार वालों से घर लौटने का वादा किया था, जो बलिकरन ने निभाया भी, मगर उनके आने का अंदाज निराला था। बलिकरन लौटे मगर लकड़ी के ताबूूत में, उसी तिरंगे में लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की कसम उन्होंने खाई थी। 

जांबाज बलिकरन सिंह की शहादत पर सरकार ने उनके घर तक पक्की सड़क व उनके नाम पर अस्पताल या स्कूल खुलवाने का वादा किया था। लेकिन अभी भी घर जाने के लिए लोगों को पगडंडी का सहारा लेना पड़ता है। अस्पताल तो दूर स्कूल भी सरकार ने खुलवाना मुनासिब नहीं समझा है। 

बहराइच के तत्कालीन जिलाधिकारी इंद्रजीत वर्मा ने शहादत के बाद परिवारीजनों को तीन एकड़ जमीन उपलब्ध कराई थी। इसके अलावा शहीद बलिकरन सिंह के बड़े बेटे सुनील को रेलवे में नौकरी दी गई। तत्कालीन डीएम ने परिवार को एक पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी देने का वायदा किया था, लेकिन यह आज भी पूरा नहीं हो सका है। 

ग्रामीणों ने शहीद बलिकरन सिंह के सम्मान में गांव का नाम बलिकरनसिंह पुरवा रखा है। लेकिन आज भी यह गांव राजस्व अभिलेखों में त्रिकोलिया के नाम से दर्ज है। प्रशासन ने भी गांव को बलिकरन सिंह पुरवा के नाम से स्वीकार नहीं किया है। बनाया गया स्मारक भी बदहाल है। 

इंसेट 
संक्षिप्त जीवन परिचय
जन्म- वर्ष 1951
मृत्यु- 28 मई, 1999
पिता- दानबहादुर सिंह
माता- कंवरिपती
पत्नी- फूलमती
पुत्र- एक बेटा व चार बेटियां। 
शिक्षा- बसंतपुर प्राथमिक पाठशाला व जूनियर हाईस्कूल हुजूरपुर।

कारगिल युद्ध ने पाक को बता दी उसकी हैसियत
कारगिल युद्ध को पाकिस्तान ने छद्म तरीके से लड़ा था। देश के पास 1999 में आधुनिक संसाधन नहीं होने के बावजूद भारतीय सैनिकों ने वीरता का परिचय दिया। यह बातें पयागपुर निवासी सेना के पूर्व हवलदार संजीव कुमार ने कहीं। वहीं सरबदी विशेश्वरगंज निवासी सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर सदानंद शुक्ला ने कहा कि अपनी सैन्य ताकत के दम पर सेना ने पाकिस्तान को उसकी औकात बता दी थी।

नरायनसिंहपुरवा निवासी पूर्व कैप्टन दरबारा सिंह और सिसैया चूड़ामणि निवासी भूतपूर्व नायक जगदीश बख्श सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में चीन सीमा पर बढ़ रहे तनाव पर सेना के सभी सेवानिवृत्त जवान और अधिकारी भी नजर बनाए हुए हैं। लेकिन अब सेना आधुनिक संसाधनों व हथियारों से काफी मजबूत हो चुकी है। इस समय देश की सेना से टक्कर लेने वाले विरोधियों को मुंह की खानी पड़ेगी। 
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