बहराइच। विशेष पॉक्सो अदालत ने हरदी के करीब नौ साल पुराने नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म और अपहरण के मामले में आरोपी वलीउद्दीन को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने पीड़िता और उसकी मां के बयानों में गंभीर विरोधाभास तथा डीएनए जांच में आरोपी का बच्चे का जैविक पिता नहीं पाए जाने को अहम माना। विवेचना में लापरवाही पर तत्कालीन विवेचक उपनिरीक्षक दयानंद यादव के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए एसपी को निर्णय की प्रति भेजने का निर्देश दिया।
अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पॉक्सो अरबिंद कुमार गौतम की अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आया कि एफआईआर में वलीउद्दीन नामजद नहीं था। विवेचना के दौरान कलीमुद्दीन का नाम वलीउद्दीन किए जाने के बाद उसे आरोपी बनाया गया। पीड़िता और उसकी मां के बयानों में आरोपी की पहचान व भूमिका को लेकर विरोधाभास मिले। चश्मदीद अजीज अहमद ने भी पीड़िता को किसी के साथ जाते देखने से इन्कार किया।
अदालत ने पीड़िता की बरामदगी को लेकर मां, पीड़िता और विवेचक के बयानों में भी एकरूपता नहीं पाई। बरामदगी के करीब 18 दिन बाद मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज हुआ, जिसका अभियोजन संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका। अदालत के आदेश पर वलीउद्दीन, पीड़िता और उसके बच्चे का डीएनए परीक्षण कराया गया। विधि विज्ञान प्रयोगशाला गोरखपुर की रिपोर्ट में पीड़िता और बच्चे के बीच जैविक मातृत्व की पुष्टि हुई, लेकिन वलीउद्दीन बच्चे का जैविक पिता नहीं पाया गया। अदालत ने विवेचक दयानंद यादव की विवेचना को लापरवाहीपूर्ण माना। आदेश में कहा गया कि एफआईआर में नामजद अतीक को विवेचना में विदेश यात्रा के टिकट के आधार पर आरोप से अलग किया गया, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई।