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नदी पर संकट

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बिछिया (बहराइच)। कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के बीचोबीच से होकर बहने वाली नेपाल की गेरुआ नदी अचानक सूख गई है। इससे नदी में गैंगेटिक डाल्फिन की उछलकूद तो गुम हुई ही, धूप सेंकते घड़ियाल और मगरमच्छ भी नहीं दिख रहे। शीतकाल में प्रवास के लिए आने वाले साइबेरियन पक्षी की चहचहाहट भी जंगल के वातावरण में सुनाई नहीं दे रही है। नदी के अचानक सूखने से जलीय जीवों के सुरक्षा पर संकट उत्पन्न हो गया है।
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में नेपाल के पहाड़ से कई नदी और नाले जंगल के बीच से होकर बहते हैं। इन्हीं में शामिल है नेपाल की गेरुआ नदी। यह नदी कोठिया घाट से भारतीय सीमा क्षेत्र में प्रवेश कर कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के बीच से होकर बहती है। चौधरी चरण सिंह गिरिजापुरी बैराज पर गेरुआ नदी का नेपाल से आने वाली काड़ियाला नदी से संगम होता है। फिर यहां से घाघरा नदी बनती है। बैराज के फाटक की साफ-सफाई हर 6 महीने पर होती है। इसके चलते बैराज के सभी फाटक खोल दिए जाते हैं। इस पर गेरुआ और कौड़ियाला नदियों का पूरा पानी घाघरा नदी में जा गिरता है। जिससे दोनों नेपाली नदियां सूखी नजर आती हैं। इस बार भी दो दिन पूर्व चौधरी चरण सिंह गिरिजापुरी बैराज पर मरम्मत के लिए सभी फाटक खोल दिए गए हैं। जिसके चलते 24 घंटे में नदी पूरी तरह से सूख गई है। जिससे जलीय जीव गैंगेटिक डाल्फिन, मगरमच्छ और घड़ियाल भी कहां चले गए पता नहीं। इस समय गेरुआ नदी की हालत यह है कि आराम से लोग पैदल नदी पार कर रहे हैं। प्रवास के लिए साइबेरियन पक्षी हर साल गेरुआ नदी मेें आते हैं। मौसम आहट दे रहा है। लेकिन नदी के सूखने से जहां प्रवासी पक्षी किनारा कस सकते हैं। वहीं कतर्निया आने वाले पर्यटकों को भी निराशा हो सकती है। डाल्फिन की उछलकूद और साइबेरियन पक्षियों का दीदार पर्यटक नहीं कर सकेंगे।
गेरुआ नदी में हैं यह जलीय जीव
डाल्फिन- 75
घड़ियाल- 250
मगरमच्छ- 150
स्टीमर और नाव भी हुए बेकार
नदी के सूखने से कतर्नियाघाट पर मौजूद स्टीमर और नावें भी नदी की तलहटी में बैठ गई हैं। जलमार्ग का आवागमन पूरी तरह से ठप हो गया है।
जलीय जीवों को नहीं होगा नुकसान
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के प्रभागीय वनाधिकारी जीपी सिंह व डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन का कहना है कि नदी के सूखने से जलीय जीवों को कोई खास नुकसान नहीं होगा। यह जलीय जीव घाघरा व गेरुआ नदी के नेपाल सीमा में इकट्ठा नदी के पानी में चले जाते हैं। पुन: नदी में पानी आने पर जलीय जीव अपने पुराने स्थान पर 48 से 72 घंटे में लौट आते हैं।
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साइबेरियन पक्षियों से महरूम रह सकता जंगल
डीएफओ ने कहा कि जलीय जीव तो अधिकांशतया सुरक्षित रहेंगे। लेकिन साइबेरियन पक्षियों का अभाव जरूर खलेगा। क्योंकि नवंबर से जनवरी के मध्य का समय ऐसा है जब साइबेरियन देशों से आने वाले पक्षी लोगों के आकर्षण का केंद्र होते हैं।
वर्ष में दो बार होती है नदी के सूखने की स्थिति
चौधरी चरण सिंह गिरिजापुरी बैराज के अवर अभियंता एसआर वर्मा का कहना है कि प्रतिवर्ष अप्रैल से मई के मध्य व अक्तूबर से नवंबर के मध्य बैराज के गेटों की मरम्मत, पेटिंग के लिए फाटक पूरी तरह से ऊपर उठा दिए जाते हैं। जिस कारण दोनो नदियों का पानी घाघरा में चला जाता है। इससे नदी सूखी नजर आती है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति एक से डेढ़ माह तक रहने की संभावना है। फाटक बंद करने पर धीरे-धीरे पानी फिर इकट्ठा होगा और नदी पुराने स्वरूप में आ जाएगी।
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