कैसरगंज (बहराइच)। चहलारी नरेश बलभद्र सिंह का बलिदान दिवस शुक्रवार को कैसरगंज में मनाया गया। इस मौके पर वक्ताओं ने कहा कि अपने जीवन की परवाह किए बिना चहलारी नरेश ने तुर्कों और मुगलों से जमकर लोहा लिया और विजय गति प्राप्त की।
कैसरगंज में चहलारी नरेश बलभद्र सिंह का बलिदान दिवस मनाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महेंद्र प्रताप सिंह ने की। इस दौरान केडीसी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सत्यभूषण सिंह ने कहा कि 13 जून 1857 की क्रांति के बलिदानी चहलारी नरेश बलभद्र सिंह ने इस धारणा को पलट कर रख दिया था कि देश के विषय में बहुत लंबे समय से चली आ रही थी कि तुर्कों और मुगलों के आक्रमणों के समय भारतीय स्थानीय शासक पूरी तरह उदासीन रहे। लेकिन बलभद्र सिंह के बलिदान ने यह सिद्ध कर दिया कि अवध की सत्ता भले ही वाजिद अली शाह के हाथ में रही हो, लेकिन मातृभूमि की रक्षा सबसे ऊपर है।
अवध के नवाब वाजिद अली शाह की अंग्रेजों के हाथ पराजय के बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी उनकी बेगम हजरत महल के हाथ में आ गयी थी। उन्होंने अवध की सेना का नेतृत्व करने के लिए पुत्र का संबोधन करके बलभद्र सिंह को निमंत्रित किया था। मां का आदेश मानकर मात्र 18 साल के तरुण बलभद्र सिंह ने अवध की सेना का नेतृत्व करते हुए 13 जून 1858 को रेठ नदी के तट पर नवाबगंज, बाराबंकी में वीरगति प्राप्त की।
अमर बलिदानी की साझा संस्कृति का वह संदेश आज भी बहराइच के लोगों को प्रेरणा देता है। संबोधन के बाद सभी लोगों ने चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह के 161वें बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि दी। उनके चित्र पर माल्यार्पण किया। इस अवसर पर अभिषेक सिंह सूरज, हारुन रशीद, ऋषभ सिंह, अनिल कुमार वर्मा, डॉ. योगेश प्रताप सिंह, विष्णु प्रताप सिंह, देवाशीष सिंह आदि मौजूद रहे।