जिला अस्पताल में दो महिला चिकित्सकों की लापरवाही के चलते वर्ष 2008 में एक गर्भवती बरामदे में तड़पती रही थी। ऑपरेशन के लिए 10 हजार रुपये घूस नहीं दे पाने के चलते प्रसव नहीं कराया गया था। इसके कारण गर्भस्थ शिशु की मौत हो गई थी। मामले में केस दर्ज हुआ था मगर पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगाकर मामले को रफादफा करने की कोशिश की।
इस पर पीड़ित ने सिविल जज प्रवर खंड प्रथम/एसीजेएम न्यायालय में पुन: प्रार्थनापत्र दिया। जिसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने मुकदमे को स्टेट केस में दर्ज करते हुए फाइनल रिपोर्ट निरस्त कर दी है। साथ ही जिला अस्पताल की दोनों महिला चिकित्सकों को सम्मन जारी किया है। न्यायालय की कार्रवाई से स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा है।
दीवानी कचहरी के अधिवक्ता मोहम्मद असलम ने बताया कि आठ जून 2008 को खैरीघाट के नकौहुआ गांव निवासी अकील अपनी पत्नी पम्मी को प्रसव पीड़ा होने पर जिला महिला अस्पताल ले गया था। जहां ड्यूटी में तैनात डॉ. अंजू श्रीवास्तव ने पम्मी का ऑपरेशन कर प्रसव कराने को कहा। ऑपरेशन के लिए 10 हजार रुपये की डिमांड की थी।
मगर अकील तत्काल पैसे की व्यवस्था नहीं कर सका। इस पर चिकित्सक ने तड़प रही पम्मी को भर्ती तक नहीं किया। सुबह डॉ. सुषमा सिंह ड्यूटी पर पहुंचीं तो उन्होंने रात्रि का केस होने के चलते देखने से इंकार कर दिया। 11 जून को सामान्य हालत में पम्मी ने मृत शिशु को जन्म दिया। इस पर अकील ने सीएमएस व अन्य अधिकारियों के यहां गुहार लगाई थी।
सुनवाई नहीं होने पर उसने 156/3 के तहत न्यायालय में प्रार्थनापत्र दिया। न्यायालय के आदेश पर नगर कोतवाली पुलिस ने 29 फरवरी 2012 को डॉ. अंजू श्रीवास्तव व डॉ. सुषमा सिंह के खिलाफ केस दर्ज किया। मगर विवेचक उपनिरीक्षक केके त्रिपाठी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर केस रफादफा कर दिया।
इस पर अकील ने सिविल जज प्रवर खंड प्रथम/एसीजेएम के न्यायालय में फाइनल रिपोर्ट के खिलाफ पुन: प्रार्थनापत्र दिया। एसीजेएम ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की फाइनल रिपोर्ट निरस्त कर प्रार्थनापत्र को स्वीकार कर लिया।
साथ ही मुकदमे को स्टेट केस के रूप में दर्ज करने की बात कही। न्यायालय ने डॉ. अंजू श्रीवास्तव व सुषमा सिंह को सम्मन जारी कर तलब किया है। दोनों महिला चिकित्सकों को 12 जनवरी को पेशी पर हाजिर होना है।