बहराइच। ‘हम दो व हमारे दो’ की परिकल्पना को साकार करने की जिम्मेदारी तराई में आधी आबादी सिर्फ अपने कंधों पर ढो रही है। जबकि पुरुष इस ओर संजीदा नहीं है। इससे नसबंदी का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है।
जिले की आबादी हर साल पांच से आठ फीसदी बढ़ रही है। 2011 में जनसंख्या जहां 34 लाख थी, वहीं इस समय जिले की आबादी 41 लाख के आसपास है।
यानी सात सालों में सात लाख आबादी बढ़ गई है। लेकिन जिले में संसाधन जस के तस हैं। परिवार नियोजन भर पेट भोजन और हम दो हमारे दो का जुमला सुखद है।
लेकिन सरकारी मशीनरी व लोगों की बेरुखी के कारण यह नारा सिर्फ फाइलों में सिमटा हुआ है। प्रचार-प्रसार के अभाव में परिवार नियोजन योजना दम तोड़ रही है।
एक तरफ जहां देश के लिए जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ी समस्या बन गई है। वहीं, विकास के तमाम प्रयासों पर तेजी से बढ़ती जनसंख्या पानी फेर रही है।
परिवार नियोजन के अभियान भी इस पर अंकुश लगा पाने में कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं। लोग इसको लेकर संजीदा नहीं हैं, खासतौर पर पुरुष।
बहराइच जनपद के चार नगरीय क्षेत्रों और 14 विकासखंडों में वर्ष 2001 में आबादी का आंकड़ा 23 लाख 81 हजार 72 के करीब था। लेकिन इसके 10 साल बाद वर्ष 2011 में हुई जनगणना ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए।
वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार जिले की आबादी बढ़कर 34 लाख 87 हजार के करीब पहुंच गई। जो वर्ष 2017-18 में लगभग 41 लाख के करीब पहुंच चुकी है।
जिले का कुल भू-भाग 5237 हेक्टेयर में फैला हुआ है। वर्ष 2001 में जिले की आबादी का ग्रोथ 29.20 फीसदी था तो वर्ष 2011 में यह डेढ़ गुना अधिक होते हुए 46.48 फीसदी पर पहुंच गया।
जिले की लगातार बढ़ रही आबादी के बीच वर्ष 2001 में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 867 थी। लेकिन यह वर्ष 2011 में बढ़कर 892 हो गई है। इस बढ़ते हुए ग्राफ को प्रशासनिक अधिकारी एक सुखद संकेत के रूप में देख रहे हैं।
डॉक्टर बाबू उनकी नसबंदी मत करिये...
तमाम मिन्नतों के बाद पिछले पांच वर्ष में सिर्फ 42 पुरुषों ने नसबंदी कराई। पिछले वर्ष तो एक भी पुरुष नसबंदी के लिए आगे नहीं आए।
कारण, जब किसी तरह पुरुष नसबंदी के लिए तैयार हो भी जाते हैं तो महिलाएं कहती हैं कि डॉक्टर बाबू उनकी नसबंदी मत कीजिएगा, नहीं तो कमजोर हो जाएंगे।
घर का कामकाज कैसे होगा। एक अनचाहा डर अभियान पर पानी फेर रहा है। जबकि सीएमओ का कहना है कि पुरुष नसबंदी महिला नसबंदी की अपेक्षा ज्यादा सरल है।
पिछले पांच सालों में हुए नसबंदी के आंकड़े
वर्ष पुरुष महिला कुल
2013-14 19 3162 3181
2014-15 26 2927 2951
2015-16 28 3640 3668
2016-17 41 4232 4273
2017-18 61 5537 5598
कागजों पर निपटा जनसंख्या जागरूकता पखवारा
स्वास्थ्य महकमे की ओर से 27 जून से 10 जुलाई तक जनसंख्या जागरूकता पखवारा मनाया गया। लेकिन यह सिर्फ कागजों तक सीमित रहा है।
अब जनसंख्या स्थिरता पखवारा मनाने की तैयारी की जा रही है। यह 11 जुलाई से शुरू होगा। इसके तहत मुख्यालय पर हेल्थ मेला लगेगा, जिसमें लोगों को नियोजन संबंधी स्थाई विकल्पों के बारे में जागरूक किया जाएगा।
जनसंख्या नियोजन के उपाय
अस्थायी विकल्प के रूप में कॉपर-टी का प्रयोग।
गर्भ निरोधक गोलियां मुफ्त में बांटी जाती हैं।
आपातकाल परिस्थितियों में ई-पिल्स दवा का प्रयोग।
पुरुष कंडोम का प्रयोग कर सकते हैं।
स्थायी विकल्प के तौर पर नसबंदी कराएं।
पुरुषों की हो सशक्त भागीदारी
जनसंख्या नियंत्रण में स्वस्थ्य मानसिकता के साथ पुरुषों की सशक्त भागीदारी होनी चाहिए। परिवार को छोटा रखने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की नहीं है। संकीर्ण मानसिकता से उबरना होगा। नसबंदी के विकल्पों को अपनाकर ही जनसंख्या नियंत्रण में भागीदार बना जा सकता है।
-डॉ. ओपी पांडेय, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल
सबकी जिम्मेदारी , परिवार नियोजन में भागीदारी
विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली है। परिवार नियोजन के अनेक विकल्प मौजूद हैं। इसके लिए लोगों को जागरूक होना होगा।
ताकि बच्चों को भरपेट भोजन व उचित शिक्षा मिल सके। सशक्त मानसिकता के साथ पुरुषों को आगे आना होगा। बच्चों के जन्म में पांच साल का अंतर रखना जरूरी है।
-डॉ. अरुण पांडेय, सीएमओ
महिलाओं की न हो अनदेखी
परिवार में महिलाओं की अनदेखी रुकनी चाहिए। नियोजन की जिम्मेदारी के लिए पुरुषों को आगे आना होगा। तभी आबादी के बीच संतुलन स्थापित होगा।
-मेजर डॉ. एसपी सिंह, उप प्राचार्य किसान महाविद्यालय
परिवार नियोजन के प्रति जागरूक जरूरी
वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ञा त्रिपाठी ने कहा कि बढ़ती आबादी को रोकने के लिए महिलाओं में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुष इन मामलों में कम संवेदनशील होते हैं। जिला महिला अस्पताल की चिकित्सक डॉ. दीपिका ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से महिला और पुरुष नसबंदी, परिवार नियोजन के संरक्षित उपाय आदि के लिए जागरूकता शिविर आयोजित किए जाते हैं लेकिन इन शिविरों में पुरुषों की सहभागिता कम ही दिखाई देती है।