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सर्वशिक्षा अभियान को पलीता

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बहराइच/मटेराचौराहा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे का अधिकार है। लेकिन महसी तहसील के बहाऊपुरवा गांव में एक भी स्कूल नहीं है। गांव से स्कूल की दूरी पांच किलोमीटर है। ऐेसे में सुरक्षा के चलते अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। इस समय पांच वर्ष से 14 आयु वर्ग के लगभग 200 बच्चे गांव में निरक्षर हैं। जिन्होंने आज तक स्कूल नहीं देखा। गांव के प्रधान ने कई बार ने शासन और प्रशासन को पत्र लिखकर प्राथमिक विद्यालय खोलने की आवाज उठाई, पर कार्रवाई नहीं हुई। जिससे बच्चे अशिक्षित रहकर परिवारीजनों के साथ खेतीबारी में हाथ बंटा रहे हैं।
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बेसिक शिक्षा विभाग सब पढ़े-सब बढ़े के नारों के साथ प्रतिवर्ष नए सत्र का शुभारंभ करती है। लेकिन जिले के कछार क्षेत्र में स्थित शिवपुर विकास खंड के ग्राम पंचायत देवदत्तपुर के मजरा बहाऊपुरवा स्थित है। इस गांव की आबादी दो हजार है। गांव के बच्चे इस नारे के बारे में कुछ जानते ही नही हैं। इसका मुख्य कारण गांव में एक भी प्राथमिक व जूनियर विद्यालय का न होना बताया जा रहा है। बहाऊपुरवा गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवदत्तपुर में प्राथमिक विद्यालय है। लेकिन वहां तक जाने के लिए एक ही पगडंडी मार्ग है। यह मार्ग भी गांव के उत्तर तथा दक्षिण दिशा में बहने वाली सरयू नदी से घिरी हुई है। मई माह से सितंबर माह तक मार्ग पर पानी भरा रहता है। बच्चों की सुरक्षा के चलते परिवारीजन उन्हें स्कूल नहीं भेजते। ऐसे में इन बच्चों का भविष्य खेलकूद के साथ अभिभावकों के साथ खेतों में काम करते हुए बीत रहा है। पढ़ाई के बजाए अधिकांश बच्चे अपने माता-पिता के साथ खेतीबारी में हाथ बंटा रहे हैं। गांव में स्कूल न होने से बहाऊपुरवा गांव में स्कूल न होने 200 से अधिक बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। गांव में न तो बिजली है और न ही चलने के लिए सड़क।

स्कूल का नाम सुना तो पर गये नाही
बहाऊपुरवा गांव निवासी 12 वर्षीय कुलदीप, 10 वर्षीय कलावती, आठ वर्षीय गुड़िया, सुशील तथा रमेश कुमार आदि से जब स्कूल के बारे में पूछा गया तो सभी ने कहा कि स्कूल का नाम सुने तो हैं। लेकिन हमरे गांव में नाय है, इससे हम गये नाही। स्कूल बन जात तो हम भी जाइत।
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हमहू चाहित है कि हमरो बच्चे बनें डॉक्टर व इंजीनियर
शिवपुर विकास खंड के ग्राम पंचायत देवदत्तपुर बहाऊपुरवा गांव निवासी प्रह्लाद से जब बच्चों के पढ़ाई न करने के मामले में पूछा गया तो बोले कि गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्कूल है। मार्ग भी ठीक नहीं है। एक तरफ काफी दूरी तक तालाब है तो दूसरी तरफ नहर। झाड़ झंखाड़ का रास्ता है। जिससे बच्चों की जिंदगी जोखिम में रहती है। पूर्व में कई घटनाएं हो चुकी हैं। इसीलिए स्कूल नहीं भेजते। कुछ यही कहना है गांव निवासी तीरथराम व उनके नामराशी का। उन्होंने कहा कि हमहू चाहित है कि हमरो बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बनें। लेकिन प्रशासन ध्यान नाय देत है। रंगीलाल ने कहा कि स्कूल होता तो बच्चे नाम जरूर रोशन करते। लेकिन स्कूल न होने से सभी खेती बारी में हाथ बंटा रहे हैं। इसका हम सबको भी दुख है।

कई बार लिखा पत्र लेकिन नहीं हुई कार्रवाई
गांव के ग्राम प्रधान रुस्तम अली से जब शिक्षा की समस्या पर बात की गई तो उन्होंने बताया कि विद्यालय खोलने जिलाधिकारी को तीन बार प्रार्थना पत्र दे चुके हैं। अश्वासन मिला लेकिन अब तक इस समस्या पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।कार्रवाई भी शून्य है।

जूनियर स्कूलों में भी नहीं होता एडमिशन
गांव के बच्चों की प्राथमिक कक्षा में पढ़ाई की उम्र खेलकूद और खेतों में काम करते हुए बीत जाती है। बड़े होने पर गृह शिक्षा दिखाकर अभिभावक जूनयिर विद्यालय में प्रवेश दिलाने की कोशिश करते हैं तो शिक्षक अनपढ़ होने की बात कहकर प्रवेश लेने से इंकार कर देते हैं। एकशिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सर्वशिक्षा अभियान लागू होने के बाद जूनियर कक्षा में गृह शिक्षा का कालम नहीं है। प्राथमिक कक्षा उत्तीर्ण वोने की मार्कशीट लगानी पड़ती है।

नहीं थी जानकारी, सर्वे करवाकर भेजेंगे प्रस्ताव
गांव में स्कूल न होने की जानकारी नहीं थी। एक से डेढ़ किलोमीटर के दायरे में स्कूल होना चाहिए। अब तक क्यों नहीं खुला, जांच करवाएंगे। सर्वे करवाने के बाद स्कूल स्थापना का प्रस्ताव शासन को भेजेंगे। -विभा सचान, खंड शिक्षा अधिकारी
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