बड़ौत। इतिहास के हर पन्ने पर बागपत की अमिट कहानी है। रावण के नाम पर बड़ागांव और महाभारत के लाक्षागृह के चिह्न आज भी मौजूद हैं। चर्चाएं तो खूब हुईं, फसाने भी बनते रहे, लेकिन कभी जिले के इन धरोहर का ढंग नहीं बदला। सिस्टम ने आंख बंद कर ली और धीरे-धीरे इतिहास मिटता रहा।
खत्म हो रहे बरनावा के टीले
बड़ौत। महाभारत का लाक्षागृह बरनावा में है। मेरठ और कुरुक्षेत्र के बीच होने के कारण इस बात को बल भी मिलता है। ऊंचे टीले में इतिहास छिपा है। यहां पर उत्खनन जरूर हुआ, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा। टीले पर मालिकाना हक के लिए मुकदमा चल रहा है। ऐतिहासिक स्थल को विकसित करने के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए। यही वजह है कि बरनावा अब रामभरोसे हैं।
इसलिए प्रसिद्ध है बरनावा
बरनावा में पांच हजार साल पुराना पांडवों का लाक्षागृह होने का दावा किया जाता है। हालांकि कुछ सालों पहले हुई खुदाई का कोई नतीजा नहीं निकला था। लेकिन खंडहर में सुरंग आमने-सामने बनी हैं। इतिहासकारों का कहना है कि पांडवों ने लाक्षागृह के नीचे सुरंगों को निर्माण करवाया था। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन का कहना है कि बरनावा गांव में महाभारतकाल का लाक्षागृह टीला होने के प्रमाण है। यहां एक सुरंग भी है। यहां पांडव किला भी है, इसमें अनेक प्राचीन मूर्तियां हैं। दक्षिण में सौ फीट ऊंचा और 30 एकड़ भूमि पर फैला टीला है। टीले के नीचे दो सुरंग स्थित है। वर्तमान में टीले के पास एक गोशाला, श्रीगांधी धाम समिति, वैदिक अनुसंधान समिति तथा महानंद संस्कृत विद्यालय स्थापित है।
सिनौली से निकला इतिहास, संजोए कौन
सबसे पहले वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खोदाई का कार्य कराया गया था। यहां हड़प्पा कालीन शवदान गृह मिला था। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई थी। इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन से चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं। साल 2018 में सिनौली में हुए उत्खनन में यहां ऐतिहासिक रथ और कंकाल मिले। इसके बावजूद बरनावा के लाक्षागृह बरनावा व सिनौली क्षेत्र धरोहर होने के बावजूद यहां पर कोई खासा ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
क्रांति स्थल है बिजरौल गांव
बड़ौत। 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुई क्रांति में बिजरौल गांव के रहने वाला बाबा शाहमल ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। क्रांतिकारी बाबा शाहमल के नेतृत्व में छह हजार किसानों की फौज थी, जिसने बल्लम और भालों जैसे देशी हथियारों से ही अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे।
बाबा शाहमल ने बड़ौत तहसील पर हमला बोलकर सरकारी खजाना लूट लिया था। अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने उन्हें बड़ौत क्षेत्र का सूबेदार नियुक्त किया। बाबा शाहमल ने दो बार यमुना का पुल भी तोड़ दिया था जिससे अंग्रेज दिल्ली न जा सके। बाबा शाहमल लड़ते-लड़ते बड़का गांव के जंगल में शहीद हो गए थे। उनकी बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं।
ये बोले लोग
सरकार को प्रयास कर जनपद की धरोहर को सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए। - विपिन पूनिया
बरनावा और सिनौली पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। ये जनपद बागपत की धरोहर है, स्थानीय प्रशासनिक अफसरों व जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। - विनीत मलिक
बरनावा का प्राचीन लाक्षाग्रह