बागपत। चकबंदी के बाद मुकीमपुरा गांव के रामपाल को अपनी ही जमीन पर कब्जा नहीं मिल सका तो वह 25 साल पहले न्यायालय में चले गए। उनका यह वाद डीडीसी (उप जिला चकबंदी) न्यायालय में चल रहा है। इस वाद का निस्तारण अभी तक नहीं हुआ है, लेकिन रामपाल की जिंदगी की डोर कई साल पहले टूट गई है। उनकी मौत के बाद बेटा संजीव उर्फ कल्लू इसमें पैरवी कर रहा है।
इस तरह से राजस्व न्यायालयों में तारीख पर तारीख मिल रही है और नहीं मिल रहा है तो वह केवल वाद का निस्तारण। वाद कारियों की चक्कर काटते-काटते उम्र बीत रही है और जिस जमीन के लिए वह चक्कर काटते हैं, उसका फैसला होने से पहले उनकी मौत तक हो रही है। क्योंकि यहां वाद निस्तारण का समय बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बामनौली, बरनावा, मुकीमपुरा, बिजरौल समेत अन्य कई गांवों में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान हुई अनियमितता और उसके बाद राजस्व न्यायालयों में बढ़ा वादों का बोझ है। जमीन के आपसी विवाद और न्यायालयों का नियमित नहीं चलना भी वाद लंबित होने का बड़ा कारण है।
जमीन भी चली गई, अब चक्कर काट रहे
केस 1: बामनौली गांव के राधे श्याम के पास 12 बीघा जमीन थी। चकबंदी में उनको जिस जगह जमीन मिली थी। वहां कब्जा नहीं मिलने पर कब्जे के लिए 2003 से डीडीसी कोर्ट में वाद दायर करके मुकदमा लड़ रहे हैं। उनको मुकदमा लड़ने के बाद नौ बीघा जमीन तो मिल गई। तीन बीघा जमीन के लिए अभी भी मुकदमा लड़ रहे है और उनको चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
12 साल में जमीन की जगह पर नहीं हुआ फैसला
केस 2: बागपत के पुराने कस्बे के रहने वाले रिढ़कू और धर्मबीर के बीच करीब साढ़े सात बीघा जमीन के बंटवारे की जगह तय करने का मुकदमा वर्ष 2011 से एसडीएम बागपत के न्यायालय में चल रहा है। रिढ़कू की कोरोना काल में मौत हो चुकी है और अब उनका पोता पंकज पैरवी कर रहा है। 12 साल बाद ही न्यायालय में यह तय नहीं हो सका है कि किसको किस जगह पर जमीन मिलनी चाहिए। यह तय कराने के लिए वह चक्कर काट रहे हैं।
यहां राजस्व के 14 न्यायालयों में करीब तीन हजार वाद
यहां राजस्व के विवादों का निस्तारण करने के लिए 14 न्यायालय है। इनमें डीएम, एडीएम के अलावा तीन एसडीएम, तीन तहसीलदार, तीन नायब तहसीलदार के न्यायालय है। जबकि डीडीसी चकबंदी, एसओसी चकबंदी, सीओ चकबंदी के न्यायालय है। इनमें करीब तीन हजार वाद लंबित है।
एसडीएम और तहसीलदार न्यायिक को लगाया
यहां एसडीएम और तहसीलदार के नियमित न्यायालय में नहीं बैठने के कारण वादों की सुनवाई में देरी नहीं हो। उसके लिए एसडीएम न्यायिक व तहसीलदार न्यायिक को लगाया गया है। बागपत व बड़ौत तहसीलों में यह व्यवस्था की गई है।
यह है मुख्य कारण
-हड़ताल ज्यादा होना
-नियमित रूप से अधिकारियों के न्यायालय में नहीं बैठना
-वादी-प्रतिवादी के कई बार तारीखों पर नहीं आना
-पत्रावलियों में देरी होना
न्यायालय नियमित नहीं चलते हैं। क्योंकि कभी अधिकारी नहीं बैठते है तो कभी अधिवक्ताओं की हड़ताल हो जाती है। अगर नियमित न्यायालय चलाए जाए तो वादों का निस्तारण जल्द होने की उम्मीद है। - नरेश कुमार, पूर्व अपर जिला शासकीय अधिवक्ता राजस्व
हमारे पास अन्य कार्य भी काफी होते है, इसलिए न्यायालय में बैठने की जगह क्षेत्र में जाकर विवादों को सुलझाना पड़ता है। इसलिए भी समस्या रहती है तो हड़ताल रहना और वादी-प्रतिवादी के कई बार तारीख पर नहीं आने से भी वादों का निस्तारण होने में समय लगता है। - सुभाष सिंह, एसडीएम