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विदेश में रहकर भी मन में बसी रही मातृ भाषा

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डॉ.राम करण शर्मा - फोटो : BAGHPAT
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विदेश में रहकर भी मन में बसी रही मातृ भाषा
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बागपत। विदेशों में रहकर भी भारतीयों के मन में मातृ भाषा बसी रही। विदेशों में खुद हिंदी बोलते रहे। उनसे किसी ने हिंदी सीखने की इच्छा जताई तो उसको भी हिंदी सिखाई। विदेशों में हिंदी को बढ़ावा भी देने में लगे हुए हैं।
सुभानपुर गांव के अक्षत त्यागी कई साल से यूक्रेन में रहकर व्यापार करते थे। उनकी शादी भी यूक्रेन में हुई थी। यूक्रेन में अक्षत त्यागी अपने दोस्तों के साथ समय बिताते तो वह आपस में हिंदी में बात करते थे। उनकी पत्नी ओकसाना त्यागी ने खुद भी हिंदी सीखने की इच्छा जताई और अब वह हिंदी के सामान्य शब्दों को बोलने लगी है। अक्षत त्यागी बताते हैं कि उनकी पत्नी ओकसाना भी नमस्कार, ठीक हो, क्या कर रहे हो, इस तरह के सामान्य बोलचाल में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को सीख गई है। इसके अलावा कई अन्य लोगों ने उनसे हिंदी सीखी है। वह कहते है कि हिंदी उनकी मातृ भाषा है जो उनके दिल में बसी हुई है।
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ट्योढ़ी के रहने वाले डॉ. रामकरन आईआईटी दिल्ली से पीएचडी करने के बाद फेलोशिप मिलने पर शोध करने के लिए अमेरिका चले गए। डॉ. रामकरण शर्मा चीन, अमेरिका, इटली, जापान में काम कर चुके हैं। वह इस समय एंजाइम पर सऊदी अरब स्थित किंग अब्दुल्ला इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक के तौर पर यूरोप व अमेरिका के वैज्ञानिकों के साथ शोध कर रहे हैं। डॉ. रामकरण ने बताया कि वह पहले जिन देशों में काम कर चुके हैं, वहां भारतीय भी रहते थे। वहां सभी भारतीय मिलने पर कभी अंग्रेजी व अन्य भाषा में बातचीत नहीं करते है, बल्कि अपनी मातृभाषा हिंदी में बात करते थे। उनको बातचीत करते देखकर विदेशों के रहने वाले दोस्त भी हिंदी के सामान्य बोलचाल के शब्द सीखकर बातचीत करने लगे हैं। डॉ. रामकरण बताते हैं कि उनके दो बच्चे हैं, जिनको इंटरनेशनल स्कूल में हिंदी सिखाने के लिए विशेष शिक्षक मिलते हैं और उनके बच्चों के साथ ही अन्य कई बच्चे भी हिंदी सीखते हैं। इस तरह से विदेशों तक हिंदी का परचम लहर रहा है।

अक्षत त्यागी- फोटो : BAGHPAT

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