विशेषज्ञों का कहना है कि सामूहिक परिवार नहीं होने के अलावा परिजनों के कामकाज में व्यस्त रहने के कारण बच्चे अकेले महसूस करने लगते हैं। अकेलेपन के कारण बच्चे गलत संगत में फंसकर नशा करना शुरू कर देते हैं और उससे सोचने समझने की शक्ति प्रभावित होने लगती है।
घर में परेशानी होने पर बच्चे शांति की तलाश करते है और नशे की ओर बढ़ जाते है। पहली बार नशा करने पर बच्चे आराम महसूस करते है और धीरे-धीरे नशे के आदी बन जाते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि नशा दिमाग को प्रभावित करता है। लगातार नशा करने से नींद की कमी के कारण बच्चे तनावग्रस्त हो जाते हैं।
मानसिक रोग विशेषज्ञ का कहना है कि नशा करने के लिए बच्चे नए-नए तरीके खोजते हैं। जिला अस्पताल में एक महीने में लगभग 90 बच्चे ऐसे आ रहे है जो नशे के कारण मानसिक रोग का शिकार हुए हैं। ऐसे बच्चों का काउंसिलिंग के बाद इलाज कराया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि नशा व्यक्ति का मानसिक संतुलन खो देता है। मरीजों की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाने के लिए पारिवारिक स्थिति के साथ उनके आस-पास के माहौल के बारे में भी जानकारी ली जाती है। नशे के आदी हो चुके बच्चों का काउंसिलिंग के साथ दवाइयों से उपचार किया जाता है।