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शहीद पदम सिंह ने खून से लिखी थी बलिदान की अमर गाथा

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शहीद पदम सिंह ने खून से लिखी थी बलिदान की अमर गाथा
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कारगिल दिवस पर विशेष
हवलदार पदम सिंह धामा ने मातृभूमि के लिए सीने पर खाई थी गोली, मरते दम तक दुश्मन पर करते रहे फायरिंग
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत। मातृभूमि के लिए कारगिल में सीने पर गोली खाने वाले वीर शहीदों की अमर कहानियां घर-घर सुनाई जाती हैं। बलिदानी बेटों की अमर गाथा युवाओं को जोश से लबरेज कर देती हैं। शहादत के 21 बरस बाद गम का समंदर भी है, लेकिन हजारों फीट ऊंची चोटियों पर शान से फहराता तिरंगा परिजनों का सीना चौड़ा कर देता है।
द्रास सेक्टर में बिनौली के हवलदार पदम सिंह धामा ने देश के लिए जान दी थी। शहीद के भाई सौराज सिंह धामा बताते हैं कि आठ मई 1999 को अपनी टुकड़ी के साथ हवलदार पदम सिंह मोर्चे पर डटे थे। हजारों फीट ऊंची चोटी पर सेना आगे बढ़ रही थी। लड़ाई के दौरान सीने पर गोली लगी और पदम गंभीर घायल हो गए। उनके साथियों ने बताया था कि अंतिम सांस तक वह देश के लिए लड़ते रहे और दुश्मन पर गोली चलाते रहे।
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शहीद का एक बेटा डॉक्टर, दूसरा कर रहा एमफिल
चार मार्च 1980 में ग्रेनेडियर रेजिमेंट में भर्ती होकर देश सेवा का जो संकल्प लिया था, उसे द्रास सेक्टर में पदम सिंह ने सर्वोच्च बलिदान देकर पूरा किया। सौराज सिंह बताते हैं कि सरकार ने जो घोषणाएं की थीं, वह पूरी हुईं। किसी से कोई शिकायत नहीं है। पदम सिंह की पत्नी मुकेश देवी बड़ौत में रहती हैं। बेटा निखिल धामा ईएनटी डॉक्टर है। दूसरा बेटा अक्षय धामा दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमफिल कर रहा है। बेटी शालू की शादी हो चुकी है और दूसरी बेटी विशु पढ़ाई कर रही है।
18 हजार फीट ऊंची चोटी पर जीते, मगर टेबल पर हार गए : बीएस पंवार
बागपत। अति विशिष्ठ सेना मेडल प्राप्त सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर बीएस पंवार का कहना है कि कारगिल की लड़ाई में भारतीय सेना के शौर्य का लोहा दुनिया ने देखा और माना। सैनिकों ने शहादत दी। 18 हजार फीट की ऊंचाई से दुश्मन को भगाकर जमीन को कब्जामुक्त कराया, मगर टेबल पर हम हार गए।
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बीएस पंवार कहते हैं कि मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान ने दूसरों देशों से मध्यस्थता कराई, तब जाकर मेज पर बातचीत हुई, लेकिन हमें क्या मिला। हम दुश्मन को सुरक्षित तरीके से वापस जाते हुए देखते रहे। सेना का शौर्य कम नहीं हो जाता, लेकिन पाकिस्तान के साथ जो भी लड़ाइयां हुई हैं, उनमें हर बार टेबल पर हमने कुछ हासिल नहीं किया। साल 1965 की लड़ाई में हाजी पीर दर्रा हमने कब्जा करने के बावजूद छोड़ दिया। क्यों छोड़ दिया, जबकि यह सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने सरेंडर किया, लेकिन टेबल पर हमारी कौन सी शर्त मानी गई। सेना वीरता से लड़ती है और लड़ती रहेगी। लेकिन इस रवैये को कब तक ढोया जाएगा। कारगिल की लड़ाई दुनिया की सबसे मुश्किल लड़ाइयों में एक थी। एयरफोर्स ने सेना का साथ दिया। वीर सैनिकों की शहादत पर हमें गर्व है। हर सैनिक भर्ती होने के दौरान युद्ध के लिए रोमांचित होता है। कारगिल के वक्त मैं ब्रिगेडियर के तौर पर हिसार में तैनात था। सैनिकों का इतना जोश याद करके आज भी रोमांच हो जाता हूं।
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