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सरौरा को भी चाहिए एक मसीहा 

Thu, 02 Jun 2016 11:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
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सरौरा गांव में रहने के लिए परिवार द्वारा बनाई गई झोपड़ी, आंगन में गोबर का लेप करती महिला। - फोटो : amar ujala
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बागपत के दोघट में डीएम के खाते में ब्राह्मण पुट्ठी है, सांसद का आदर्श गांव पलड़ी। इनमें अफसर भी पहुंचे हैं और राजनीति करने वाले भी, लेकिन मुजफ्फरनगर की सीमा से सटे तवेला गढ़ी गांव के मजरे सरौरा को सिस्टम भूल गया है। हिंडन के किनारे बसे गांव के हैंडपंपों के हलक से निकलने वाले जहरीले पानी को पीने के लिए लोग मजबूर हैं। नतीजा कैंसर जैसी बीमारी से कई ग्रामीणों की मौत हो चुकी है। बीमारियों की भरमार है। शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था नहीं। तरक्की का पायदान यह है कि पूरे गांव में एक सरकारी नौकर है। बुजुर्गों को यहां पेंशन नहीं मिलती। इसी आबादी के गर्भ से निकलकर अब तक कई गांव बस चुके हैं, लेकिन सरौरा आज भी पीड़ा से छटपटा रहा है। बेबस ग्रामीण नाउम्मीद हो चुके हैं।
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सरौरा से निकले 24 गांव
ग्रामीण के अनुसार सरौरा की आबादी से निकलकर अब तक 24 गांव बस चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं कुरथल, नगवा टाली, मुनहोड़ा, नौला, कुरालसी, हथासारी, मुंडावली छोटी-बड़ी, मितली, गोरीपुर और बिगल हैं, लेकिन सरौरा पर अब तक सरकारी सिस्टम की मेहरबानी नहीं हो सकी है।

इस हिंडन का क्या करें?
कभी जीवनदायिनी रही हिंडन नदी के पानी से अब ग्रामीण बीमारियों की चपेट में हैं। भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि गांव में तीन तरफ हिंडन नदी का प्रवाह है। गांव चारों और से वन से घिरा है। प्रदूषण से भूजल स्तर खराब हो चुका है, इससे गांव में त्वचा और पेट संबंधी बीमारियां फैली हुई हैं।
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सात हैंडपंप और पांच ट्यूबवेल
आबादी के लिए सात हैंडपंप लगे हैं, लेकिन सभी नलों का पानी प्रदूषित हो चुका है। ग्रामीण के अनुसार मजबूरी में ही इनसे पानी लेकर पीना पड़ता है। गांव की 1200 बीघा जमीन उपजाऊ है। सिंचाई करने के लिए केवल पांच नलकूप हैं।

किसी को कैंसर, किसी के पैर खराब
प्रदूषित जल का सेवन करने के कारण गांव के अधिकांश लोगों में कैंसर जैसी बीमारी फैल रही है। गांव के ओमपाल सिंह कैंसर से पीड़ित हैं। महीपाल की कैंसर से मौत हो चुकी है। अशोक के पैर खराब हो गए हैं। यह तो बस उदाहरण मात्र हैं, यदि पूरे गांव का दौरा करें तो गांव की बेबसी इससे भी कहीं ज्यादा भयावह है।

बालक इंटर, बालिकाएं निरक्षर
गांव में 15 साल पहले प्राथमिक विद्यालय बना था, छह साल पहले जूनियर हाईस्कूल बना। वर्तमान में गांव के 10 -15 युवक इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुके हैं। गांव का रवि बिजली विभाग में बाबू है, लेकिन इसके अलावा गांव में कोई गांव का व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है। गांव की  दो-चार बालिकाओं को छोड़कर अधिकतर बालिकाएं निरक्षर ही रह जाती हैं। 

बूढ़े हैं, पेंशन नहीं मिलती
ग्रामीण रमेश, रवि, अजब, राम कुमार और भानु प्रताप ने बताया  केवल 20 घरों में शौचालय है, 58 घरों में आज तक शौचालय की सुविधा नहीं है। ग्रामीणों को वृद्धावस्था, विधवा या विकलांग पेंशन भी नहीं मिलती है। कोई स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है। गांव रास्ते खराब पड़े हैं, गांव में बस स्टैंड भी नहीं है। ग्रामीणों को राशन लेने के लिए तवेला गढ़ी गांव जाना पड़ता है। 

प्रधान की रिपोर्ट कार्ड
ग्राम प्रधान राजीव कुमार उर्फ पम्मी ने बताया  58 शौचालयों की लिस्ट बनाकर जिला प्रशासन को भेजी है। 105 लोगों के राशन कार्ड बनवा दिए गए हैं। पेंशन के पात्र लोगों के फार्म भरवाएं जाएंगे। पेयजल टंकी का प्रस्ताव पास हो चुका है। प्रधान ने भी माना कि गांव में समस्याएं ही समस्याएं हैं। गांव में पीने का पानी दूषित हो चुका है। इसकी शीघ्र ही जांच कराई जाएगी। उन्होंने कहा गांव की समस्याएं हल करने के लिए प्रयास किया जा रहा है।
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