बागपत। रालोद का ढाई दशक से हर लोकसभा चुनाव में नया साथी रहता है और सभी पार्टियों से रालोद का गठबंधन रह चुका है। मगर उसे भाजपा का साथ सबसे ज्यादा भाया है। विपरीत लहर होने के बाद भी भाजपा के साथ से अभी तक रालोद सबसे ज्यादा पांच सीटें जीत चुका है।
रालोद के बनने के बाद पहली बार 1999 में चौधरी अजित सिंह समेत सात प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। उस चुनाव में रालोद को कांग्रेस का साथ मिला था और पहली बार में रालोद को दो सीट मिलीं थी। उसके बाद 2004 में रालोद को सपा का साथ मिला और दस सीटों पर रालोद के प्रत्याशी उतरे, मगर रालोद के तीन सांसद बने सके। 2009 में रालोद ने भाजपा को अपना साथी बनाया और सात सीटों पर चुनाव लड़कर रालोद के पांच प्रत्याशी सांसद बने।
इसके बावजूद 2014 में रालोद ने साथी बदल दिया और चुनाव में कांग्रेस का साथ लेकर आठ सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन मोदी लहर में उनका एक भी प्रत्याशी जीत दर्ज नहीं कर सका। चौधरी अजित सिंह खुद बागपत से भाजपा के डाॅ. सत्यपाल सिंह से चुनाव हार गए। रालोद 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से सपा व बसपा के साथ आ गया और आठ सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिला। इस बार भी उसका खाता नहीं खुला। चौधरी अजित सिंह व उनके बेटे चौधरी जयंत सिंह दोनों ही चुनाव हार गए।
भाजपा का साथ अभी तक सबसे ज्यादा फायदेमंद
इस तरह नल के निशान पर रालोद ने पांच लोकसभा चुनाव लड़े और सभी में कोई न कोई उसका साथी रहा। मगर भाजपा का साथ अभी तक उनको सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हुआ है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में रालोद के सबसे ज्यादा सांसद बने। विपरीत लहर होने के बाद भी रालोद के पांच सांसद चुने गए थे। इस बार भी रालोद के लिए भाजपा के साथ पुराने समीकरण बनते दिख रहे हैं और वह दोनों सीटों पर परिणाम अपने पक्ष में करने के लिए पूरी जोर आजमाइश कर रहा है।