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चाय बेचने के कारण स्कूल से निकाला

Fri, 06 May 2016 01:55 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, बागपत
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चाय बेचते छात्र के पिता। - फोटो : अमर उजाला
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बागपत।  बड़ौत में चाय की दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति का आरोप है कि उसके बेटे को स्कूल ने केवल इसलिए टीसी थमा दी कि उसका पिता चाय बेचता है। दो साल से छात्र की पढ़ाई छूट गई है। अब वह दुकान पर पिता का हाथ बंटा रहा है। डीआईओएस कार्यालय में स्कूल और अभिभावक ने लिखित में अपना-अपना पक्ष रखा है। 
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मामला जनपद के बड़ौत की लार्ड महावीरा एकेडमी का है। आर्य नगर निवासी मंगतराम जैन मोहल्ला ठाकुरद्वारा में चाय बेचते हैं। जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. आशुतोष भारद्वाज से मिलने पहुंचे मंगतराम ने बताया उसका बेटा अरिहंत जैन महावीर एकेडमी में पढ़ता था। सत्र 2013-14 में कक्षा पांच उत्तीर्ण की, लेकिन स्कूल ने कक्षा छह में प्रवेश देने के बजाए उसकी टीसी काट दी।

पिछले दो वर्ष से अभिभावक छात्र की पसंद के चलते लार्ड महावीरा एकेडमी में ही प्रवेश कराने के लिए प्रयासरत हैं। स्कूल प्रबंधन ने प्रवेश से इंकार कर दिया। शिकायतों का दौर शुरू हुआ। डीएम ह्दय शंकर तिवारी के निर्देश पर जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. आशुतोष भारद्वाज ने दोनों पक्षों को बुलाया। मंगतराम जैन का आरोप है उसे स्कूल प्रबंधन ने चाय की दुकान चलाने वाला कहकर बच्चे का प्रवेश करने से इंकार किया है। अभिभावक ने स्कूल प्रबंधन और प्रधानाचार्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की मांग की है।
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सवाल छात्र के भविष्य का
औसत छात्र अरिहंत जैन पिछले दो साल से घर में बैठा है। कक्षा पांच में उसे 48.20 प्रतिशत अंक मिले थे। मंगतराम ने कहा वह चाहता है कि पुराने स्कूल में पढ़ाने से उसका बेटा पढ़ाई में और अधिक मेहनत कर बेहतर हो सकता है।

स्मृति ईरानी तक पहुंचा मामला
छात्र के पिता ने बताया डीआईओएस मामले की जांच कर रहे हैं। एडमीशन के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से गुजारिश की गई थी। उन्होंने जल्द ही मुलाकात कर मामले की सुनवाई का आश्वासन दिया है।

खुद टीसी कटाकर ले गए थे अभिभावक
स्कूल के प्रधानाचार्य विक्रम सिंह दानी ने कहा बच्चे के अभिभावक खुद ही स्कूल से टीसी कटवाकर ले गए थे। संस्था में सभी वर्गों के बच्चे पढ़ते हैं। चाय वाला कहने का आरोप बेबुनियाद है। टीसी कटाने के कारण संस्था ने बच्चे के दोबारा एडमीशन पर विचार नहीं किया। दो साल से अगर पढ़ाई छुड़वाने के बजाए अन्य किसी संस्था में बच्चे का एडमीशन कराया जा सकता था। संस्था को बदनाम करने की साजिश है, किसी भी वर्ग के बच्चे से कोई परहेज नहीं। संस्था का कार्य बच्चों को शिक्षित करना है, न की उनके अभिभावकों का पेशा देखना। 
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