आचार्य सुभद्र मुनि ने कहा बिना श्रद्धा के कोई कार्य नहीं हो सकता। यदि श्रद्धा है तो छोटी-मोटी नदी क्या समुद्र को भी पार किया जा सकता है।
बृहस्पतिवार को जैन स्थानक मंडी में आयोजित धर्मसभा में उन्होंने कथा सुनाते हुए बताया किसी गांव के बाहर एक साधु को एक वृद्धा प्रतिदिन खाना लेकर आती थी। एक दिन नदी में अधिक पानी आने के कारण बुढ़िया साधु को खाना लेकर नहीं पहुंची । अगले दिन साधु के पहले दिन खाना नहीं लाने का कारण बुढ़िया से पूछा तो बुढ़िया ने नदी में पानी अधिक आने की बात बताई।
तब साधु ने कहा माता जब श्रद्धा होगी और भगवान पर भरोसा होगा तो कोई भी चीज नहीं रुकती। दो दिन बाद फिर नदी में पानी बढ़ा तो बुढ़िया भगवान का नाम श्रद्धा पूर्वक लेकर पानी में घुसी और आगे बढ़ती चली गई।
उन्होंने एक अन्य प्रसंग में बताया एक बार एक बुढ़िया के पास राजा चंद्र गुप्त गए। जब वे पाटलिपुत्र पर हमला करके हार मानकर चले गये थे तो उस बुढ़िया ने एक बच्चे को गर्म-गर्म खिचड़ी दी तो बच्चा गर्म खिचड़ी को एकदम खा गया और उसका मुंह जल गया। बुढ़िया ने कहा तुमने चंद्र गुप्त की तरह कार्य किया है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
तब चंद्र गुप्त जब बुढ़िया के पास खड़े थे तो उन्होंने पूछा माई चंद्र गुप्त ने ऐसा क्या किया था। बुढ़िया ने कहा बेटा पहले किसी छोटे राज्य पर हमला करके उसे जीतने के बजाय एकदम पाटलिपुत्र जैसे बड़े राज्य पर हमला कर दिया और हार गया।
इस मौके पर पूनम जैन और त्रिलोक चंद जैन को आठ दिवसीय उपवास का संकल्प आचार्य श्री ने दिलाया। धर्मसभा में मुख्य रूप से श्यौप्रसाद जैन, अमित राय जैन, सुभाष चंद जैन, अनिल जैन, सुशील जैन, प्रवीण कुमार, सुरेंद्र जैन, त्रिलोक चंद जैन, मनोहर लाल, सुदेश जैन, हंस कुमार जैन, जगदीश प्रसाद जैन, श्रषभ जैन, अनिल जैन आदि उपस्थित रहे।