-अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में जैन मुनि विशुभ्र सागर ने किए प्रवचन
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बड़ौत। जैन संत मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने कहा कि वस्त्र में मलिनता है, जब-तक यह बोध नहीं होगा, तब-तक कोई वस्त्र नहीं धुलेगा। वस्त्र को स्वच्छ करना है, तो पानी चाहिए, ऐसे ही परिणामों की पवित्रता चाहिए तो गुरुवाणी चाहिए।
जैन मुनि मंगलवार को अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि क्षमा आत्मिक गुण है, क्षमा अहिंसा है। क्षमा जीवन-नीति है। क्षमा धर्म का आधार है। क्षमा शांति का उपाय है। नीतिज्ञ पुरुष बीज को नष्ट नहीं करते, वह बीज से फसल उगाते हैं। बीज को बचाकर रखते हैं, शेष का उपभोग करते हैं। संसार के सुख चाहिएं तो पुष्य का संग्रह करो। जैसा संसर्ग करोगे, वैसा भाव होगा। विचारों का जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। विचारवान बनो। विचार करोगे, वैसा कार्य होगा। विचार प्रभावित करते हैं। श्रेष्ठ विचारकों का साहित्य पढ़ो, विचारों से विकास होता है। अच्चे-विचार पढ़ो, विनाश से बच जाओगे। क्रोध का अंधा, पुण्य क्षीण, ईष्यालु-पुरुष स्वयं-ही ऐसे खोटे काम करता है, जिससे कष्ट को प्राप्त होता है। पुण्य कार्य करो, पाप से बचो। शाम को गुरुभक्ति में मुनि संघ के सानिध्य में विमर्श जागृति मंच परिवार के सौजन्य से आदिनाथ भगवान की दीप अर्चना, भक्तामर विधान के माध्यम से की गई। इसमें 48 परिवारों के द्वारा एक-एक दीप समर्पित किया गया। विधान में सुभाष जैन, प्रमोद जैन, राजकुमार जैन, विवेक जैन, अमित जैन, वरदान जैन, सुधीर जैन, अनुज जैन, राकेश जैन आदि शामिल रहे।