दो बार मुख्यमंत्री व देश के प्रधानमंत्री रहे
एक जुलाई 1952 को यूपी मेें उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला। उन्होंने लेखपाल के पद का सृजन भी किया। किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उप्र भूमि संरक्षण कानून को पारित किया। 3 अप्रैल 1967 को उप्र के मुख्यमंत्री बने।
17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में मध्यावधि चुनाव में उन्हें अच्छी सफलता मिली और दोबारा से 17 फरवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वे केंद्र में गृहमंत्री बने। 28 जुलाई 1989 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस यूथ के सहयोग से प्रधानमंत्री थे।
चौधरी चरण सिंह, अजित सिंह और जयंत चौधरी
- फोटो : Amar Ujala
ग्रामीण जीवन की रखते थे गहरी समझ
चौधरी चरण सिंह किसान राजनीति के क्षीतिज पर लगभग पांच दशक तक छाए रहे। वह कृषि अर्थव्यवस्था की गहरी समझ रखने वाले उच्च कोटि के विद्धान, लेखक एवं अर्थशास्त्री थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता है।
उन्होंने गाजियाबाद में वकालत शुरू की और 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और तीन बार कारावास झेला। उन्होंने सरकारी नौकरियों में कृषकों और कृषि मजदूरों के बच्चों के लिए 50 फीसदी आरक्षण की मांग की थी।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय
उनकी स्पृष्टवादी, ईमानदारी ओर सादगी का विपक्ष भी मानता है लोहा
छपरौली विधायक डा अजय कुमार बताते हैं कि राजनीति में उन जैसी शख्सियत फिर कोई नहीं हुई। आम आदमी, गरीब और किसान के सच्चे हितैषी थे। राजनीति में गरीबों को आगे बढ़ाया।
लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक गरीब और खेती किसानी से जुड़े लोगों को वह लेकर गए। कहा कि स्पष्ट सोच और सटीक फैसले उनकी ताकत थी। वह किसान के लिए हमेशा फिक्रमंद रहे। किसी तरह के लोभ में कभी नहीं फंसे और कार्यकर्ताओं को भी हमेशा लालच से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे। उनकी स्पृष्टवादी, ईमानदारी और सादगी का विपक्ष भी लोहा मानते हैं।
पश्चिम यूपी में हाईकोर्ट की बेंच चाहते थे चौधरी साहब
वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बैंच का मुद्दा भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह ने 38 साल पहले उठाया था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसे पश्चिम उत्तर प्रदेश के हक में बताया था। वर्ष 1981 में बागपत के अधिवक्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल उनके दिल्ली स्थित आवास पर जाकर मिला और हाईकोर्ट बैंच के लिए समर्थन मांगा। इस पर बड़े चौधरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर जनता की मांग न्यायोचित ठहराया था। इस पत्र की प्रतिलिपि बड़े चौधरी ने हाईकोर्ट बैंच की संघर्ष समिति मेरठ को भी भेजी थी।