बागपत में केंद्र और राज्य सरकार बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा के लाख दावे करें, लेकिन बाघू और संतोषपुर गांव में हकीकत सिस्टम का मुंह चिढ़ा रही है। सुरक्षा, जागरूकता का अभाव और गांव में शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने से पचास फीसदी बेटियां आठवीं के बाद ड्राप आउट हो जाती हैं। इनमें आर्थिक रुप से कमजोर परिवारों की बेटियों की संख्या सबसे अधिक हैं।
जिला मुख्यालय से मात्र पांच किमी दूर बसे बाघू और संतोषपुर गांव में शिक्षा व्यवस्था बेपटरी है। चौंकाने वाला सच यह है कि दोनों गांव की पचास फीसदी बालिकाएं आठवीं के बाद स्कूल तक नहीं पहुंच रही। अमर उजाला ने इसकी पड़ताल की। जागरूकता का अभाव, सुरक्षा की चिंता और गांव में शिक्षा व्यवस्था नहीं होना इसका बड़ा कारण सामने आया। आठवीं के बाद गांव में स्कूल नहीं है।
बालिकाओं को बागपत, टटीरी, बली और निरोजपुर भेजकर पढ़ाने का विकल्प है, लेकिन निरोजपुर और टटीरी जाने वाले रास्तों और स्कूल के बाहर आए दिन छेड़छाड़ के मामले समाचार पत्रों में उजागर होने से आजिज अभिभावक बालिकाओं को घर बैठा लेते हैं। ड्रॉप आउट बालिकाओं की संख्या एक या दो नहीं बल्कि दोनों गांव में पचास फीसदी हैं। इनमें अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बालिकाएं भी शामिल हैं।
गांव संतोषपुर के प्रधान रमन चौधरी एडवोकेट और बाघू के प्रधान सुमित कुमार स्वीकार करते हैं कि सुरक्षा, जागरूकता और स्कूल नहीं होना कारण ही बालिकाएं ड्राप आउट हो रही हैं। वार्ड 41 के बीडीसी प्रमोद गुर्जर के अनुसार स्कूलों की दूरी गांव से अधिक होने और असुरक्षा की भावना के चलते अधिकांश परिवार अपनी बेटियों को आठवीं के बाद स्कूल नहीं भेज रहे हैं। क्षेत्र के ब्राह्मण पुट्ठी गांव का भी यही हाल है।
यह है दोनों गांव की शिक्षा व्यवस्था
बागपत। बाघू और संतोषपुर की आबादी करीब चार-चार हजार हैं। संतोषपुर में केवल एक प्राथमिक विद्यालय है। बाघू में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय है, लेकिन उच्च प्राथमिक विद्यालय की हालत खस्ता है। आठवीं तक की पढ़ाई दोनों गांव के बच्चे संत मैरी स्कूल में करते हैं। रमन चौधरी एडवोकेट कहते हैं संत मैरी को दसवीं तक कराने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि बालिकाएं आगे पढ़ सकें। बालकों को पढ़ाने के लिए किसी तरह गांव के बाहर भेजा जाता है।
कुछ ऐसे छलका बेटियों का दर्द
स्कूल छोड़कर घर बैठी सरिता और अलका कहना है कि वह पढ़ना चाहती थी, लेकिन अभिभावक दूसरे गांव में भेजने के लिए तैयार नहीं है। पढ़ाई छूट गई है, इससे परेशानी होती है। दीपांशी, निशा, अंजलि, आशा और बॉबी कहती हैं कि गांव में स्कूल नहीं होने से टटीरी जाना पड़ता है, इससे दिक्कत होती है। आने जाने के साधनों की भी कमी भी है। फरीन ने कक्षा पांच तक की पढ़ाई कर ली है, लेकिन वह नहीं जानती कि अब वह पढ़ाई करेगी या नहीं।
क्या कहते हैं अभिभावक
बागपत। अभिभावक शकुंतला, जगरोशनी और ईश्वर ने कहा बागपत पैदल जाना आसान नहीं है। दूसरे गांवों में स्कूल के बाहर कई बार छात्राओं के साथ छेड़छाड़ के मामले सामने आ चुके हैं। गांव से पैदल मार्ग पर स्कूल समय पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है। इस कारण बालिकाओं को आठवीं के बाद बाहर के गांव में पढ़ने के लिए नहीं भेजते। गांव में स्कूल का निर्माण होना चाहिए। ऐसी बालिकाओं की बड़ी संख्या है, जिन्होंने केवल आठवीं तक ही पढ़ाई की है।
यह मेरा पैतृक गांव है। यहां स्कूल नहीं होने के कारण समस्या है। गांव में जमीन नहीं मिल पाने के कारण संस्था का निर्माण नहीं कराया जा रहा है। जल्द ही स्कूल बनवाया जाएगा। ताकि गांव की बालिकाओं को उच्च शिक्षा मिले।
- साहब सिंह, सलाहकार, राज्य पशुधन विभाग।
पोषण मिशन की गांव में हुई मीटिंग के बाद बालिकाओं के बड़ी संख्या में स्कूल से ड्राप आउट होने का मामला सामने आया था। असुरक्षा की भावना, आर्थिक कमजोरी, जागरूकता का अभाव और शिक्षा व्यवस्था नहीं होना इसका बड़ा कारण है। अभिभावकों को मामले में और अधिक जागरूक करने का प्रयास किया जाएगा। प्रशासन को अवगत कराया जाएगा।
- रेहाना सुल्ताना, जिला समन्वयक, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।
मामले की जांच होगी। स्कूलों के बाहर और रास्तों पर छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अभिभावक इस तरह के किसी भी मामले की पुलिस को तुरंत सूचना दें।
- रवि शंकर छवि, एसपी बागपत।