कोरोना से मौत के बाद अंतिम संस्कार करते सरकारी कर्मचारी
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कोरोना महामारी ने कई परिवारों को बेसहारा कर दिया। परिवार के इकलौते कमाने वालों की जिंदगी भी यह बीमारी लील गई। अब ऐसे परिवारों के सामने गुजर-बसर का संकट खड़ा हो गया। परिवार के बच्चों के भविष्य पर भी संकट है।
बिनौली ब्लाक के एक गांव निवासी व्यक्ति मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। पैसे कमाने के लिए वह गुजरात की राजधानी अहमदाबाद पहुंच गए। अप्रैल माह के अंत में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। इस कारण वह अपने गांव आ गए। कई चिकित्सकों के यहां उपचार कराया, लेकिन तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। सांस लेने में दिक्कत होने पर उन्हें मुजफ्फरनगर के अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां आठ दिन भर्ती रहने के बाद तीन मई को उनकी मृत्यु हो गई। घर में कमाने वाले अकेले सदस्य के चले जाने से उनकी पत्नी के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उनके 11 व 15 वर्ष के दो बेटे और 13 वर्ष की एक बेटी हैं। जिनकी पढ़ाई-लिखाई, भरण-पोषण की चिंता अब पत्नी को सताए जा रही है।
अनाथ बच्चों को गोद लेने के इच्छुक हैं लोग
कोरोना महामारी में कई बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके माता-पिता दोनों की मृत्यु हो गई। उनका पालन-पोषण करने वाला कोई नहीं है। वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो अनाथ बच्चों को गोद लेने के इच्छुक हैं। यह एक लीगल प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है। लेकिन यदि किसी अनाथ बच्चे को फिर से नया परिवार मिल जाए तो इससे बेहतर कुछ नहीं है। ऐसे कुछ लोग अमर उजाला के संपर्क में आए हैं।