खेकड़ा। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बासमती धान के उत्पादन की जानकारी दी। साथ ही किसानों को मौसम की जानकारी देने वाले संयंत्र के बारे में भी बताया।
मंगलवार को केवीके परिसर में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में केंद्र प्रभारी डॉ. गजेंद्र पाल सिंह ने किसानों को बताया जनपद में लगभग सात हजार हेक्टेयर भूमि में धान की खेती की जाती है। इसमें से लगभग 98 प्रतिशत क्षेत्रफल पर बासमती धान की खेती की जाती है। जहां बासमती धान उत्पादन में कृषि इनपुट अधिक लगता है। बासमती फसल के अवशेष का भूसा पशुओं के चारे का उत्तम माध्यम है। बासमती में नवीनतम उत्तम किस्मों का प्रयोग कर कम खर्च में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. संदीप चौधरी ने बताया कि बासमती धान की गुणवत्ता में नर्सरी बुआई रोपाई के समय का बहुत महत्व होता है। पंद्रह जून से पूर्व धान नर्सरी की बुआई नहीं करनी चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह में रोपाई के समय मानसून आ जाता है। नर्सरी से पौधों को पानी भरकर ही उखाड़ना चाहिए। इससे फसल में होने वाले झंडा रोग से बचा जा सकता है। रोपाई के लिए बीस से पच्चीस दिन की पौध का प्रयोग करें। अधिक फुटाव के लिए बुआई के पंद्रह दिन बाद खेतों में पानी भरकर हाथों से खींचकर हल्का पानी चलाने से अधिक पुुटाव व तना छेदक कीट का नियंत्रण होता है। रोपाई से पूर्व पौध का ऊपरी भाग का लगभग तीन से चार सेंटीमीटर तोड़ देने से भी तना छेदक कीट अंडे नहीं दे पाता है।
केंद्र की मौसम विशेषज्ञ डॉ. अंकिता नेगी ने किसानों को खरीफ फसलों पर पड़ने वाले मौसम के प्रभाव की जानकारी दी। कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को मौसम की जानकारी देने वाले संयंत्र के बारे में भी बताया। इस दौरान डॉ. भूपेंद्र कुमार, डॉ. उत्तम राठी, डॉ. देवकुमार, किसान अमरदीप, पुष्पेंद्र, मनोज, मोहनलाल, कुलदीप शर्मा, सत्यजीत यादव, प्रदीप, देवेंद्र आदि मौजूद रहे।