सिनौली सभ्यता के निवासी रहे हैं भगवान पशुपति नाथ के उपासक
बड़ौत (बागपत)। भारतीय इतिहास को एक नई दिशा देने वाले सिनौली उत्खनन से प्राप्त पुरावाशेषों ने चौंकाने वाले परिणाम दिए हैं। सिनौली उत्खनन स्थल से भारत की प्राचीनतम सभ्यता के मानव शवाधान केंद्र से प्राप्त तीन रथों एवं तीन ताबूतों के ऊपर उत्कीर्ण पशुपतिनाथ की आकृतियों ने यह सिद्ध किया है कि यहां के मूल निवासी भगवान शिव के अनन्य उपासक रहे हैं। जुलाई 2018 में उत्खनन के बाद सारे विश्व के इतिहासकारों में यहां के निवासियों की संस्कृति एवं आर्थिक धारणाओं को जानने की उत्कंठा बढ़ गई है।
जनपद बागपत मेेें समय-समय पर स्थानीय इतिहासकारों द्वारा प्रारंभिक सर्वेक्षण से प्राप्त से पुरावाशेषों के आधार पर यहां के उत्खनन की मांग की जाती रही। उसी श्रृखंला में 2005 मेें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए उत्खनन के बाद शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन द्वारा 2007 में किए गए स्थलीय निरीक्षण से कुछ ताम्र निर्मित बाणाग्र के खंडित टुकडे़ मिले थे जो उनके अनुसार अत्यंत दुर्लभ व मानव सभ्यता के प्रांरभिक अवशेषों का प्रतीक हैं। उनके सुझाव पर पुन: 2018 मेें सिनौली मेें उनके बताए स्थान पर उत्खनन का कार्य प्रांरभ हुआ, जहां से अत्यंत दुर्लभ ताम्रयुगीन सभ्यता की तलवारें, ढाल, ताम्र आइने, केश सवारने की कंघियां प्राप्त हुई। साथ ही दक्षिण पूर्वी एशिया में पहली बार करीब पांच हजार वर्ष प्राचीन तीन युद्धरथ व उनके महारथियों के तीन ताबूत प्राप्त हुए।
दुर्लभ पुरावशेषों के अध्ययन के उपंरात इतिहासकार अमित राय जैन का दावा है कि भारतीय प्राचीन सभ्यता के सिनौली निवासी भगवान पशुपतिनाथ में आस्था रखते थे। उन्होंने अपनी शवाधान प्रक्रिया के दौरान दफनाए गए उच्च स्तरीय व्यक्तियों के शवों को लकड़ी के पाये सहित ताबूतों में दफनाया। ताबूतों के ऊपर ताम्र धातु से फूल पत्तियों की कारीगरी की गई। सबसे महत्वपूर्ण है कि एक सबसे बड़े ताबूत के ऊपर भगवान पशुपतिनाथ की सींगों का मुकुट पहने आठ मानवाकृति निर्मित की गई। उन मानवाकृति के हाथों में भोले शंकर के आयुद्ध व कर्ण कुंडल भी बनाए गए, जो यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं कि सिनौली सभ्यता के निवासी पशुपति भोले शंकर के प्रति निष्ठा रखते थे, तभी उन्होंने अपनी विशिष्ट शवाधान प्रक्रियाओं में भगवान पशुपतिनाथ की आकृति का अंकन किया। अपने दावे को पुष्ट करते हुए जैन का कहना है कि हड़प्पा व मोहन जोदड़ो की खुदाई मेें भी प्राचीन मानव सभ्यताओं के प्रमाणों मेें भगवान पशुपतिनाथ की पत्थर की मोहरें प्राप्त हो चुकी हैं, जो राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली की हडप्पा गैलरी में मौजूद हैं।