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मोबाइल कल्चर में गायब हो गए होली के हुलियारे

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बागपत। बदलते दौर और बढ़ते मोबाइल कल्चर में पश्चिम यूपी के होली के हुलियारों के गीत गायब हो गए हैं। दोघट गांव के होली के हुलियारों की छाप दूर तक थी। लोक गायक पृथ्वी सिंह बेधड़क के होली गीत रोया देख क रोया राजा... को आज भी गुनगुनाया जाता है। मनोरंजन के बढ़ते साधनों के कारण वर्तमान में पुरानी संस्कृति पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं।
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होली पर हुलियारे गलियों में निकलते थे। ढोल की थाप पर गाए जाते थे होली के गीत। ऐतिहासिक किस्सों पर आधारित इन गीतों को पश्चिम उत्तर प्रदेश के पूरे ग्रामीण अंचल में बेहद पसंद किया जाता था। हर गांव में गोली गीत गाए जाते थे, लेकिन ऐसे लोग भी हुए हैं, जिनके होली गीतों को दूर तक पसंद किया जाता था। होली गीत सुनने के लिए इन्हें कई-कई दिन पहले बुलाया भी जाता था। लोक गायक पृथ्वी सिंह बेधड़क ने महाभारत में अभिमन्यु वध के दृश्य पर होली गीत लिखा। उनके पौत्र सहदेव सिंह बेधड़क बताते हैं कि उनके होली गीत.. रोया देख कै रोया राजा, धर्म देख कै रोया, धर्म न देखा कहीं धड़ पड़ा, कहीं सिर पड़ा, देख कै अभिमन्यु को, रोया देख कै रोया राजा....को आज भी खूब पसंद किया जाता है। पुराने लोग इस होली गीत को सुनना पसंद करते हैं। असल में देहात में होली गीत रचने और प्रस्तुत करने की कला अलग है, जो नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच सकी है। इसकी वजह है मोबाइल कल्चर। दोघट के हुलियारों ने दूर तक अपनी छाप छोड़ी। मुजफ्फरनगर के बड़ौदा निवासी दया चंद को होली गीतों के लिए याद किया जाता है। मेरठ के दबुथवा के दीवान के नाम से होली गीत हैं। अस्सी के दशक तक होली गीत पर किताबें प्रकाशित होती थी, लेकिन धीरे-धीरे इन किताबों का प्रकाशन बंद हो गया।
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