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परिग्रह सभी प्रकार के दुखों का मूल- अरूण मुनि

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परिग्रह सभी प्रकार के दुखों का मूल - अरुण मुनि
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बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा परिग्रह सभी प्रकार के दुखों का मूल है। इसके बढ़ने से जीवन में दुख ही दुख आते हैं।
उन्होंने जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में कहा अपनी इच्छाओं को बढ़ाना ही परिग्रह होता है। जितनी वस्तु से मनुष्य का काम चल सकता है, उससे अधिक मिलने की इच्छा करना ही परिग्रह होता है। परिग्रह बढ़ाने के लिए मनुष्य की तृष्णा की कोई सीमा नहीं होती। वह सुरसा के मुंह के समान बढ़ती है। मनुष्य की एक इच्छा पूर्ण होने से पूर्व ही दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है। आखिर जीवन भर वे बढ़ती जाती है। परिग्रह बढ़ने के कारण पिता-पुत्र, मां-बेटी, भाई-भाई में बैर तक उत्पन्न हो जाता है। जमीन, जायदाद के चक्कर में आए दिन बड़े-बड़े पाप होते जा रहे हैं। अपने हिस्से पर किसी को संतोष नहीं होता। एक भाई दूसरे भाई की संपत्ति हथियाने के लिए उसको मारने तक का षड्यंत्र रच देता है। जीवन में यदि सच्चा सुख चाहते हो तो परिग्रह को मत बढ़ाओ। जितना भगवान ने दिया है, उतने में ही संतुष्ट हो जाना ही परिग्रह का त्याग कहा जाता है। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी विचार रखे। इसमें नारायण सिंह, धर्म प्रकाश, मोहर सिंह वर्मा, श्याम लाल वर्मा, सहदेव, आकाश जैन, हंस कुमार जैन, कालू जैन, दीपक जैन, कृष्णा वर्मा, शकुंतला वर्मा, शैल बाला, इंद्राणी, पूनम, छवि आदि रहे।
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