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किशनपुर में जब पूर्णचंद ने तोड़ दिया था नमक का कानून

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बागपत। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलकर स्वाधीनता की ज्वाला बागपत से भी भड़की थी। इसके सूत्रधार थे बूढ़पुर गांव में जन्मे पंडित पूर्ण चंद यानि स्वामी संपूर्णानंद सरस्वती। 28 जून 1921 को गांधी जी के आह्वान पर नमक कानून तोड़ने के कारण उन्हें किशनपुर बराल से गिरफ्तार किया तो ग्रामीण भड़क उठे, लेकिन पंडित जी ने भीड़ को समझाकर घर भेजा था।
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गांधी जी ने नमक कानून तोड़कर पैदल ही दांडी की ऐतिहासिक यात्रा आरंभ की। स्वतंत्रता सेनानियों की अग्रिम पंक्ति में शामिल रहे पंडित पूर्ण चंद आर्य ने आंदोलन में भाग लिया। उनका जन्म बूढ़पुर के किसान चौधरी लज्जा राम के घर में 13 मार्च 1900 को हुआ था। उन पर आर्य समाज का प्रभाव रहा। वर्ष 1921 में वह पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर चुने गए, लेकिन साबरमती आश्रम में देश सेवा की प्रतिज्ञा लेकर नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। वर्ष 1921 से 1930 तक राष्ट्र की विभिन्न रूपों में सेवा की। किशनपुर बिराल में गिरफ्तारी के दौरान उग्र हुए जनसमुदाय को उन्होंने गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह के मूलभूत मंत्र को बताकर शांत किया । 20 दिसंबर 1986 को ब्रह्मलीन हो गए ।

जिद पर अड़ गए जेलर को सैल्यूट नहीं
बागपत। किशनपुर बराल से गिरफ्तारी के बाद उन्हें मेरठ जेल भेजा। जेल की परंपरा थी कि जब जेलर सुबह राउंड लेता था, तब सभी बंदी उसे सैल्यूट करने के लिए लाइन में खड़े हो जाते थे। पंडित पूर्ण चंद ने इसका विरोध किया और जेल में भूख हड़ताल शुरू की। इस पर उन्हें मेरठ से मैनपुरी जेल भेजा, वहां भी उनका आंदोलन जारी रहा। आखिर उन्हें सैल्यूट न करने की छूट दे दी गई।
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पहले रोहतक, फिर पहुंचे लाहौर
बागपत। वर्ष 1930 में पूर्णचंद्र को कांग्रेस ने तहसील का डिक्टेटर चुना। सविनय अवज्ञा आंदोलन की बागडोर दी । परिवार के कई सदस्यों ने राष्ट्रीय आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई और जेल गए। उन्होंने अपनी कर्मस्थली हरियाणा में रोहतक जिले के खरेंटी ग्राम को चुना। उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना कराई , तत्पश्चात लाहौर पहुंचे, वहां ब्रह्म संस्कृत महाविद्यालय में वैदिक साहित्य का अध्ययन एवं मनन किया। उनके पांडित्य के कारण ही क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने के बाद भी उन्हें पंडित की उपाधि दी।

जब हैदराबाद में गिरफ्तार हुए
बागपत। आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब लाहौर के महा उपदेशक के रूप में आर्य समाज व स्वतंत्रता आंदोलन का कार्यभार संभाला । वर्ष 1937 में सारा देश हैदराबाद की निजाम शाही के आतंक से चीत्कार कर रहा था। तब वह हैदराबाद पहुंचे। हरियाणा की जींद जिले से 100 सत्याग्रहियों को जो उनके नेतृत्व में वहां गए थे, इनके साथ गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें एक वर्ष का सश्रम कारावास का दंड भुगतना पड़ा।

जब वह बन गए स्वामी पूर्णानंद सरस्वती
बागपत। 18 जुलाई सन 1971को राजनीतिक व पारिवारिक जीवन से सन्यास ले लिया। उसके बाद आर्य जगत में स्वामी पूर्णानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। समारोह की अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह और प्रसिद्ध आर्य विद्वान स्वामी रामेश्वरानंद जी सरस्वती ( गुरुकुल घरोंडा) ने दीक्षा दी। मेरठ आर्य समाज बुढ़ाना गेट से भी उनका गहरा ताल्लुक रहा।

इन पुस्तकों की रचना की
बागपत। पंडित पूर्ण चंद के पौत्र पूर्व आईएमए अध्यक्ष डॉ. वीरोत्तम तोमर ने बताया कि स्वामी दयानंद सन्यास आश्रम गाजियाबाद में रहते हुए उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की, इनमें मुख्य पुस्तक वृक्षों में जीव है, पोल प्रकाश, मानव शरीर और जीवात्मा , योगी का आत्म चरित्र एक षड्यंत्र की रचना की।
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